455 से अधिक महिलाएं कर रही रोजगार और परंपरागत बुनाई को संरक्षित
घर-द्वार से लेकर उद्योग तक, महिलाओं ने बनाया स्वावलंबन का नया धागा
संवाद न्यूज एजेंसी
कुल्लू। जिले की पहाड़ियों में गूंजते करघों की आवाज सिर्फ शॉल नहीं बुनती, बल्कि सैकड़ों महिलाओं के आत्मनिर्भर भविष्य की नींव भी रखती है।
भुट्टी को-ऑपरेटिव सोसायटी के ताने-बाने में आज महिलाएं परंपरा, हुनर और स्वावलंबन को एक साथ पिरो रही हैं। यहां रोजगार सिर्फ आमदनी का साधन नहीं, बल्कि महिला सशक्तीकरण और लोक विरासत को जिंदा रखने का मजबूत माध्यम बन चुका है। इस बुनकर उद्योग में 70 फीसदी महिलाएं काम कर रही हैं। इस उद्योग में महिलाएं परंपरागत बुनकर विधा को भी संरक्षित करने में अपना योगदान दे रही हैं जबकि इस परंपरागत उद्योग के माध्यम से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से 1000 लोगों को रोजगार मिला है। इसमें करीब 700 लोग सीधे तौर पर काम कर रहे हैं। इनमें 455 से अधिक महिलाएं शामिल हैं।
इस बुनकर उद्योग में 455 से अधिक महिलाएं कर्मचारी और बुनकर के रूप में काम कर रही हैं। इसके चलते महिला सशक्तीकरण की दिशा में यह उद्योग दूसरे उद्योगों के लिए प्रेरणा स्रोत बना हुआ है। इन महिलाओं में अधिकतर स्थानीय हैं जिससे उन्हें अपने घर-द्वार में रोजगार का अवसर मिला है।
गौरतलब है कि साल 1944 में 12 बुनकरों की ओर से सहकारी समिति का गठन किया गया। साल 1956 में भुट्टिको सोसाइटी के संस्थापक वेदराम ठाकुर ने कुल्लू शॉल का उद्योग शुरू किया। साल 1960 में भुंतर के पास 32 बीघा जमीन लेकर भुट्टिको सोसाइटी को कुल्लू से भुट्टी में शिफ्ट किया और उनकी मृत्यु के बाद उनके बड़े बेटे सत्य प्रकाश ठाकुर समिति को आगे बढ़ाने के काम में जुट गए। तब से लेकर आज तक इस उद्योग में सैकड़ों लोगों को रोजगार के अवसर मिल रहे हैं। इसमें अधिकतर महिलाओं को रोजगार मिल रहा है।
भुट्टिको के उत्पादन महाप्रबंधक दिनेश ठाकुर ने बताया कि यहां 70 फीसदी महिलाओं को रोजगार दिया गया है। इसके चलते महिलाओं को रोजगार प्राप्त करने का अच्छा जरिया मिला है।