सिस्टम नाकाम, मलाणा की सड़कें भी टूटीं, नेपाल के मजदूरों की पीठ पर चढ़कर चल रही जिंदगी
खतरनाक पगडंडियों से गांव तक राशन पहुंचा रहे कामगार, एक सिलिंडर का 2.000 ले रहे किराया
प्याज 120 रुपये किलो और 25 से 30 किलो चावल का कट्टा भी मिल रहा 3,500 रुपये में
गौरीशंकर
कुल्लू। हिमालय की गोद में बसा ऐतिहासिक मलाणा गांव आज अपने ही देश में बेसहारा महसूस कर रहा है। एक साल से सड़क से कटा यह गांव पूरी तरह नेपाल के कामगारों के भरोसे है।
बरसात और आपदा ने जो तबाही मचाई, उसने मलाणा को और भी अलग-थलग कर दिया है। खतरनाक पगडंडियों से होकर राशन, गैस सिलिंडर और दवाइयों जैसी जरूरी चीजें गांव तक पहुंच रही हैं। यह जिम्मेदारी नेपाली मजदूर निभा रहे हैं। वे आठ किलोमीटर की जोखिम भरी चढ़ाई रोज तय कर रहे हैं।
गांव की तरफ जाने वाली सड़क एक साल से बंद है। रही-सही कसर आपदा ने पूरी कर दी है। हालात ऐसे हो गए हैं कि गांव तक रोजमर्रा का सामान पहुंचाना भी मुश्किल हो गया है। गांव के लेकर डैम साइट तक पहुंचने के लिए खतरनाक पगडंडी के रास्ते से गुजरना किसी जोखिम से कम नहीं है। ऐसे में गांव तक सामान पहुंचाने का काम नेपाल के कामगारों से लिया जा रहा है।
गांव डैम साइट से मलाणा तक एक गैस सिलिंडर को पहुंचाने का भाड़ा 2,000 रुपये से अधिक है। लोगों को भाड़ा और कीमत मिलाकर सिलिंडर 3,000 रुपये से अधिक दाम में मिल रहा है।
गांव की दुकानों में खाद्य और अन्य जरूरत के सामान की कीमत आसमान छू रही हैं। ग्रामीणों के अनुसार 25 से 30 किलो चावल का कट्टा 3,500 रुपये में मिल रहा है। एक किलो प्याज 120 रुपये से ज्यादा दाम पर मिल रहा है। ग्रामीण भेई राम और भाग चंद सहित अन्य ने कहा कि अब गांव में कुछ समय से खाद्य वस्तुएं मिल रही हैं लेकिन इनके दाम आसमान छू रहे हैं। क्षेत्र में 100 से अधिक नेपाल के कामगार गांव तक राशन और जरूरत का सामान पहुंचा रहे हैं।
खड़ी चढ़ाई वाली आठ किमी लंबी पगडंडी बनी जीवनरेखा
आपदा से क्षतिग्रस्त हुए बांध स्थल से लेकर गांव तक पैदल चलने के लिए खतरनाक पगडंडी ही बची है। इससे ही बीमार लोगों को ले जाया जाता है और रोजमर्रा का सामान लाया जाता है। खासकर राशन और अन्य जरूरत का सामान नेपालियों के सहारे गांव तक पहुंचाना पड़ रहा है। करीब 8 किलोमीटर लंबी खड़ी चढ़ाई वाली पगडंडी से होकर कामगार राशन ढो रहे हैं। समाजसेवी शेरा नेगी ने कहा कि मलाणा वासियों को वर्ष 2024 में आपदा ने गहरे जख्म दिए थे। इस बार फिर बेरहम बरसात गांव को अलग-थलग कर गई।
हमारी कोई नहीं सुन रहा है। एक साल से गांव के लोग व्यवस्था के आगे गिड़गिड़ा रहे हैं लेकिन कुछ नहीं हुआ। इस बार बरसात और जख्म दे गई लेकिन कोई भी अधिकारी और नेता गांव तक हाल जानने नहीं पहुंचा। अब किसी से उम्मीद ही नहीं रही। किस्मत के सहारे जीवन जीने का प्रयास कर रहे हैं। - राजू राम, प्रधान, मलाणा पंचायत