जड़ी-बूटियों और हथकरघा उत्पादों को दिला रहीं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पहचान
अशोक राणा
केलांग (लाहौल-स्पीति)। जनजातीय जिला लाहौल-स्पीति की महिलाएं अपनी पुरातन सांस्कृतिक विरासत को सहेजते हुए आत्मनिर्भरता की नई मिसाल कायम कर रही हैं।
घाटी की महिलाएं पारंपरिक खाद्य वस्तुओं, हस्तनिर्मित उत्पादों और जड़ी-बूटियों को पर्यटकों और बाजार तक पहुंचाकर न केवल अपनी संस्कृति का प्रचार कर रही हैं, बल्कि इससे उनकी आजीविका भी मजबूत हो रही है। महिलाएं स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से पारंपरिक परिधान, हथकरघा उत्पाद और स्थानीय व्यंजन तैयार कर उनका विपणन कर रही हैं। सामूहिक प्रयासों से ये महिलाएं आर्थिक रूप से सशक्त बन रही हैं। अपनी विशिष्ट पहचान को नई उड़ान दे रही हैं। लाहौल की महिलाएं आज संस्कृति और स्वावलंबन के बीच एक सशक्त सेतु बन चुकी हैं।
पूनम पाल ने कहा कि उनका स्वयं सहायता समूह पिछले कई वर्षों से हिमाचल के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों में सीबक थोर्न उत्पादों, हस्तनिर्मित वस्तुओं और लाहौल के पारंपरिक व्यंजनों की प्रदर्शनियां लगाता आ रहा है। कृष्णा ने बताया कि इन प्रयासों से महिलाओं को रोजगार मिल रहा है, बल्कि लाहौल-स्पीति की समृद्ध संस्कृति और पारंपरिक उत्पादों को भी नई पहचान मिल रही है।
कांगला वास्केट स्वयं सहायत समूह की अध्यक्षा रिगजिन और हिडिम्बा स्वयं सहायता समूह जाहलमा की अध्यक्ष तेंजिन का कहना है कि जड़ी बूटियां और हस्त निर्मित उत्पाद महिलाओं की आर्थिकी को मजबूत करने का विकल्प मिल गया है।
स्पीति के स्वयं सहायता समूहों की प्रतिनिधि टशी डोलकर, लोबजंग यांगचेन, डोलमा, कलजंग छोड़ोन, देचेन छोमों, कुंगा, सोनम डोलमा, पदमा छोडोन का कहना है कि सीबक थोर्न के जूस के साथ सूखे पत्तों को बेचकर अच्छी खासी कमाई कर रहे हैं। उनका कहना है कि जूस की काफी अधिक मांग रहती है अगर विपण की व्यवस्था हो तो यह घाटी की आर्थिकी का मुख्य जरिया बन सकता है।
वंडर प्लांट को बनाया जरिया
वंडर प्लांट के नाम से मशहूर छरमा (सीबक थोर्न) को लाहौल-स्पीति की महिलाओं ने राष्ट्रीय पटल पर नई पहचान दिलाई है। खेतीबाड़ी के काम निपटाने के बाद महिलाएं ऑफ-सीजन में सीबक थोर्न का जूस निकालकर उसे बाजार में बेच रही हैं। इस कार्य में जिले के करीब 20 स्वयं सहायता समूह सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं, जिनसे लगभग 500 महिलाएं जुड़ी हुई हैं। स्वयं सहायता समूह से जुड़ी सविता, बबीता, कृष्णा, पूनम पाल और सुनीता ने बताया कि एक सीजन में महिलाएं करीब 10 हजार लीटर सीबक थोर्न जूस तैयार कर लेती हैं।
बाजार से जंग
हालांकि, मार्केटिंग की ठोस व्यवस्था न होने के कारण उन्हें उनके उत्पादों का उचित मूल्य नहीं मिल पाता। सविता ने बताया कि इसके बावजूद भी सीबक थोर्न जनजातीय महिलाओं के लिए आर्थिकी का बेहतर विकल्प बनता जा रहा है। यदि प्रशासन और सरकार का सहयोग मिले तो महिलाएं इस क्षेत्र में और अधिक सशक्त हो सकती हैं।