दशहरा में 64 वर्ष बाद शरीक हुए व्यासर के तीन देवी-देवता
अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में तीन और देवी-देवता 64 साल बाद शामिल हुए हैं। फाटी व्यासर कोठी रायसन के देवता कुंबर दान नाग, माता फंगणी और बाबा वीरनाथ ने इस बार उत्सव में शामिल होने की इच्छा जताई थी। इसके चलते हारियानों ने देवी-देवताओं को लाव लश्कर के साथ जिला मुख्यालय पहुंचाया। लिहाजा, इन देवी-देवताओं को बैठने के लिए राजा की चानणी के पीछे जगह दी गई है, जहां ये देवता टेंटों में विराजमान हो गए हैं।
देवता कुंबर दान नाग के गुर यशपाल ने बताया कि उनके तीन देवी-देवता 64 साल बाद उत्सव में शरीक होने के लिए पहुंचे हैं। हालांकि, इससे पहले उत्सव में आने की परंपरा रही है लेकिन एक दौर ऐसा भी आया जब देवी-देवताओं के साथ आने वाले लोगों को खर्च आदि की परेशानी होती थी। इस कारण देवताओं को उत्सव में नहीं लाया जा सका। इस बार देवताओं ने अपने गुर के माध्यम से देववाणी कर आदेश दिए थे कि वह भगवान रघुनाथ की चाकरी यानी सेवा करने जाना है। उन्होंने बताया कि हालांकि हमने पूर्वजों से सुना था कि उनके देवी-देवताओं का उत्सव के दौरान बैठने का स्थान प्रदर्शनी मैदान में मोहणी के पेड़ के नीचे था लेकिन उन्हें चानणी के पास जगह दी गई है। इससे हारियान खुश हैं।
देवता के कारदार ओम प्रकाश का कहना है कि इससे पहले वर्ष 1962 में उनके देवी-देवता दशहरा उत्सव में शामिल हुए थे। उस समय उनके दादा तुलू राम कारदार थे। इसके बाद परिस्थितियां ऐसी बनीं कि हरियान देवी-देवताओं को उत्सव में नहीं ले जा सके जबकि उत्सव में देवी-देवताओं को दशहरा समिति से हर बार निमंत्रण मिलता रहा है।
हर जगह एक साथ जाते हैं तीनों देवी-देवता
तीनों देवताओं की खासियत यह है कि हर जगह तीनों एकसाथ ही जाते हैं। गुर यशपाल का कहना है कि देवता कुंबर दान नाग और देवता वीरनाथ गौहरी के रथ बने हुए हैं। माता फुंगणी करनाल में बास करती हैं। उनका कहना है कि क्षेत्र में कोई भी देव आयोजन हो या फिर कहीं भी आना-जाना हो तो तीनों देवी-देवता एक साथ ही चलते हैं। देवता कुंबर दान नाग ठारा नागों में से एक हैं।