स्वास्थ्य के क्षेत्र में हिमाचल को अव्वल राज्य का दर्जा माना जाना बेमानी होगा। दुर्गम क्षेत्र लाहौल घाटी में स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे खोखले साबित हो रहे हैं। यहां सरकार ने स्वीकृत सात विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद तो स्वीकृत किए हैं लेकिन वर्षों से एक भी विशेषज्ञों चिकित्सक की तैनाती नहीं हो पाई है।
केलांग, उदयपुर, शांशा और काजा में अल्ट्रासाउंड मशीनें भी उपलब्ध हैं, लेकिन रेडियोलॉजिस्ट की तैनाती न होने से मशीनें धूल फांक रही हैं। वहीं, जिले में दो दर्जन से अधिक चिकित्सकों के पद खाली पड़े हैं। हैरानी की बात तो यह है कि क्षेत्रीय अस्पताल केलांग को छोड़कर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र उदयपुर, शांशा और काजा में अल्ट्रासाउंड मशीनें होने के बावजूद विशेषज्ञों के पद सरकार ने स्वीकृत नहीं किए हैं।
यहां के मरीजों को एक अल्ट्रासाउंड करवाने के लिए हजारों रुपये खर्च कर जिले से बाहर जाना पड़ रहा है। वर्तमान जिला अस्पताल केलांग में ही स्वीकृत सात विशेषज्ञ चिकित्सकों के अलावा पांच अन्य चिकित्सकों के पद भी रिक्त पड़े हैं। गैमूर, गोंधला, हंसा और सगनम में भी चिकित्सकों के पद खाली हैं। लाहौल-स्पीति जिला में सरकार ने एक क्षेत्रीय अस्पताल, तीन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और सोलह पीएचसी खोल रखी हैं। इनमें 40 चिकित्सकों के पद स्वीकृत हैं। जबकि, वर्तमान में 24 चिकित्सकों के पद खाली हैं।
घाटीवासी राजेंद्र कुमार, विनोद, सुरेंद्र ठाकुर और शाम चंद का कहना है कि दुर्गम क्षेत्र लाहौल-स्पीति में किसी भी सरकार ने यहां बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं को नहीं सुधारा है। तांदी पंचायत के प्रधान सुरेश कुमार ने कहा कि लाहौल के नेताओं ने स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर जनता को ही भ्रमित किया है। उधर, केलांग में तैनात मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मोहन लाल शासनी ने बताया कि हर बार घाटी में रिक्त चल रहे चिकित्सकों का ब्योरा प्रदेश सरकार को प्रस्तुत किया जाता है।