लारजी (कुल्लू)। भीषण अग्रिकांड से तबाह हुए कोटला गांव में देर शाम खुले आसमान के नीचे खेत में झपकी ले रहे एक मासूम ने कहा, आमा घरा चाल, मु आउई निंज।
जब ये शब्द लोगों ने सुने तो उनकी आंखों से आंसू रुक नहीं पाए। मां इस मासूम को कैसे बताएगी कि रातोंरात उनके आशियाने राख के ढेर में बदल चुके हैं। गांव का दृश्य इतना भयानक है कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को लेकर गांव ले जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इन सब के बीच गांव के पांच दर्जन से अधिक छह साल से कम उम्र के मासूम बच्चे अपनी ही चिंता में हैं। खेतों में बिखला रहे ये नौनिहाल समझ नहीं पा रहे हैं कि उन्हे घर क्यों नहीं ले जाया जा रहा है। सर्द रातों में अभिभावकों की गोद में सोने को मजबूर मासूमों को न नहलाने की व्यवस्था है और न ही पसंदीदा खाने की। कुछ बच्चे टीवी पर कार्टून देखने की जिद्द कर रहे हैं। बच्चे पूछ रहे हैं कि हमारा सामान खेतों में क्यों फेंका है? पापा क्यों रो रहे हैं।
गांव जलने के बाद बच्चों के अनुत्तरित कई सवालों का किसी के पास कोई जवाब नहीं है। पांच साल का अंशुल हाल ही में आंगनबाड़ी जाने लगा था। वह मां पुष्पा से बार-बार घर चलने की जिद्द कर रहा है। चार साल का पीयूष बार-बार टीवी देखने की मांग कर रहा है। पहली कक्षा में पढ़ने वाले प्रेम को अपना बस्ता जलने का दुख है। ग्रामीण रुकमणि ने कहा कि उसके तीन बच्चे हैं। घर जलने से ज्यादा गम बच्चों की हालत को देखकर हो रहा है। उधर, एसडीएम बंजार अश्वनी कुमार ने कहा कि गांव में हर उम्र के प्रभावितों के लिए जरूरत के मुताबिक सहायता पहुंचाई जा रही है। बच्चों की आवश्यकता का भी ख्याल रखा जा रहा है।