बर्फीले दर्रों और फिसलन भरी पगडंडियों से भोले के जयकारों के साथ आगे बढ़े श्रद्धालु
बारिश भी नहीं डिगा पाई मणिमहेश के लिए निकले महिलाओं, बुजुर्ग श्रद्धालुओं का उत्साह
अशोक राणा
केलांग (लाहौल-स्पीति)। बर्फीले दर्रे, फिसलन भरी पगडंडियां और कांपती सांसों के बीच भी जब कोई हर-हर महादेव कहता आगे बढ़ता है, तो समझिए यह यात्रा सिर्फ पैरों से नहीं, दिल से की जा रही है। मणिमहेश की यह डगर कठिन जरूर है, पर सच्चे भक्तों के लिए यह जीवन का सबसे पवित्र पर्व बन जाती है।
त्रिलोकनाथ पोरी मेले के अंतिम दिन को होने वाली मणिमहेश यात्रा श्रद्धा, आस्था और साहस की अनोखी मिसाल है। इसमें सैकड़ों श्रद्धालु, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल होते हैं। जयकारों की गूंज के बीच त्रिलोकनाथ मंदिर से श्रद्धालु मणिमहेश यात्रा पर रवाना होते हैं। इस बार भारी बारिश भी श्रद्धालुओं के उत्साह को डिगा नहीं सकी। करीब 90 किलोमीटर लंबी और समुद्रतल से 15 हजार फीट ऊंचे कुगती दर्रे को पार कर श्रद्धालु मणिमहेश झील की कठिन डढ़ी यात्रा को पूरा करते हैं। हर वर्ष हजारों शिवभक्त इस पवित्र यात्रा को पूरी श्रद्धा से निभाते हैं। मान्यता है कि राधा अष्टमी के दिन जब सूर्य की पहली किरण मणिमहेश झील के जल पर पड़ती है तो झील का पानी अमृत तुल्य हो जाता है। इस पवित्र जल में स्नान करने से पापों से मुक्ति और रोगों से छुटकारा मिलता है।
बेहद कठिन और रोमांचक है यात्रा
पहले दिन श्रद्धालु सेंधवाड़ी में विश्राम करते हैं। दूसरे दिन खोड़देव पधर पहुंचकर शिव और माता दुर्गा की पूजा कर अलियास में रात बिताते हैं। तीसरे दिन ग्रेचु की कठिन चढ़ाई पार कर कुगती जोत होते हुए केलंग वजीर पहुंचते हैं। चौथे दिन हिमनदियों, ग्लेशियरों और दुर्गम नालों को पार कर हनुमान झील में ठहरते हैं। पांचवें दिन गौराजा चौगान और डढ़ी का दर्रा पार करने के बाद श्रद्धालु पवित्र मणिमहेश झील में पहुंचकर स्नान करते हैं।
गगनभेदी जयकारों से गूंज उठता है वातावरण
यात्रा के दौरान वातावरण कैलाशपति की जय, माता मराली की जय, खोलडुवासी की जय, ऊंचे कैलाश की जय जैसे गगनभेदी जयकारों से गूंजता रहता है। लहौली जन-मानस में भगवान शिव के प्रति अगाध श्रद्धा इस यात्रा में स्पष्ट झलकती है। बरसात, बर्फ, ठंड और कठिन पहाड़ी रास्तों के बावजूद श्रद्धालु डढ़ी यात्रा को जीवन का पुण्य अवसर मानते हैं।