कुल्लू। हिमाचल में सीबकथॉर्न की खेती के लिए लाहौल की जलवायु अनुकूल है और किसान इस पर काम भी कर रहे हैं लेकिन खेती को बड़े स्तर पर बढ़ाने के लिए उनके सामने कई चुनौतियां हैं।
वन भूमि पर प्राकृतिक रूप से उगे सीबकथॉर्न को निकालने में तो किसानों को आसानी हो रही है लेकिन इसकी व्यवस्थित खेती के लिए जमीन, सिंचाई और बाजार से जुड़ी समस्याएं सामने आ रही हैं।
जीबी पंत हिमालयी संस्थान मौहल में सेमिनार में स्पीति से आए किसान तेजिंन टशी ने बताया कि वह बड़े स्तर पर स्पीति में सीबकथॉर्न पर काम कर रहे हैं। आने वाले समय में लाहौल-स्पीति के किसानों के सामने नई चुनौती खड़ी हो सकती है।
जिस तरह परियोजनाओं के लिए जमीन का अधिग्रहण चल रहा है, उससे सीबकथॉर्न के अलावा अन्य फसलों और फलों की खेती के लिए भी जमीन कम पड़ सकती है। किसानों की मदद के लिए सरकारी तंत्र के साथ वैज्ञानिकों को भी इस दिशा में काम करना चाहिए।
ऊंचे क्षेत्रों में सिंचाई की कमी बड़ी चुनौती
किसान इंद्रा देवी ने बताया कि लाहौल के ऊंचे क्षेत्रों में सिंचाई के लिए पानी की कमी रहती है। ऐसे में सीबकथॉर्न की खेती करना काफी मुश्किल होता है। वैज्ञानिकों को इस दिशा में काम करने की जरूरत है कि सूखे क्षेत्रों में खेती के लिए अलग से किस्म तैयार की जाए, ताकि किसानों के सामने पानी की समस्या कम हो और वे सीबकथॉर्न की कृषि कर सकें। उन्होंने कहा कि अभी ऊंचे इलाकों में लोग जंगल में प्राकृतिक रूप से उगे सीबकथॉर्न पर निर्भर हैं लेकिन इसकी गुणवत्ता उतनी अच्छी नहीं है। यदि इस दिशा में ध्यान दिया जाए तो सीबकथॉर्न घाटी में किसानों के लिए आय के अच्छे साधन के रूप में विकल्प बन सकता है।
बाजार तक पहुंचाने में भी सहयोग की कमी
किसानों के अनुसार सीबकथॉर्न के उत्पाद को बाजार तक पहुंचाने में भी अभी सरकारी तंत्र का उस स्तर पर सहयोग नहीं मिल पा रहा है, जिस तरह मिलना चाहिए। फिलहाल प्रदर्शनी आदि के माध्यम से ही किसानों को इसमें सहयोग मिल रहा है। खेती को बढ़ावा देने के साथ उत्पादों के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध करवाने पर भी ध्यान देने की जरूरत है।