कुल्लू/खराहल। कुल्लू में भारी बारिश से ब्यास ने जिस तरह रौद्र रूप धारण किया, वह भविष्य के लिए भी खतरे की घंटी है। 23 साल के बाद कुल्लू-मनाली में भारी नुकसान हो गया है। वर्ष 1995 में भी इन्हीं स्थानों पर ब्यास ने कहर मचाया था। उस समय भी मनाली से लेकर बजौरा तक काफी नुकसान हुआ था।
ब्यास के किनारे कई बस्तियों का नामोनिशान मिटा दिया है। सूबे में 378 सड़कों को दुरुस्त करने के लिए प्रयास जारी कर दिए हैं। इस बारिश से झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले भी बुरी तरह से प्रभावित हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार 1230 करोड़ का नुकसान हुआ है। विडंबना यह है कि सरकारें आती और जाती रही। लेकिन ब्यास के किनारे इन स्थानों को सुरक्षा की दृष्टि से कोई खास योजना नहीं बन सकी। कुल्लू में अधिकतर उन स्थलों पर ब्यास ने भारी नुकसान किया, जहां पर आधुनिक मशीनरी से सीधे खड़े पहाड़ों को काट कर सड़क का निर्माण किया है। ब्यास के तट के साथ असंख्य पेड़ों को विकास के नाम पर काटा गया। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि प्राकृतिक प्रवाहों के साथ छेड़छाड़ की गई है। इसका खामियाजा जनमानस को भुगतना पड़ रहा है। कुल्लू-मनाली में आठ लोग इस बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। कड़वा सच्च यह भी है कि आजादी के 71 वर्ष बाद भी हम आज बाढ़ प्रबंधन की कोई कारगर नई योजना नहीं दे पाए। लाहौल-स्पीति में वर्ष1955 के बाद ऐसी बर्फबारी हुई है।