ग्लोबल वार्मिंग से सदानीर
नालों का अस्तित्व खतरे में
नालों में बह रहा पानी सूखा, बावड़ियों का वजूद मिटा
प्राकृतिक जल सूखने के कारण पर्यावरणविद हुए चिंतित
अमी चंद भंडारी
कुल्लू/खराहल।जिला के कई प्राकृतिक स्रोत सूखने से पेयजल की किल्लत महसूस की जा रही है। हालांकि सिंचाई एवं जनस्वास्थ्य विभाग उठाऊ जल योजना के तहत दर्जनों पंचायतों को पेयजल मुहैया करवाया है। बावजूद इसके हर समय बहने वाला जल अपने-अपने गांव के नालों और बावड़ियों में अब लोगों को उपलब्ध नहीं हो रहा है।
प्राकृतिक जल स्रोत सूखने के पीछे पर्यावरण वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिंग और विकास के नाम पर पेड़ों का अंधाधुंध कटान, समय पर बर्फबारी और बारिश न होना इसका मुख्य कारण मान रहे हैं। धार्मिक स्थल बिजली महादेव की बावड़ी सूख गई है। पुईद माता जगन्नाथी की बावड़ी भी सूखने के कगार पर है। ज्वाणी महादेव की बावड़ी में बहुत कम ही रह गया है। शराउगी, बराधा, दाहठ, तानी और घराकड़ आदि गांव की बावड़ियों का अस्तित्व ही मिटा है।
देवी-देवता कारदार संघ के सलाहकार झाबे राम ठाकुर के अनुसार एक दशक पूर्व इन बावड़ियों में एक इंच से भी ज्यादा पानी होता था। 85 वर्षीय रामनाथ ठाकुर कहते हैं कि थरमाण नाले में इतना पानी था कि यहां पर धान की खेती होती थी। मौहल नाले के पानी से भी धान उगाया जाता था। सेउबाग, ज्वाणी, छथौल नाला, काईस तथा राउगी सहित जिला के अन्य क्षेत्रों के सदानीर नालों का पानी काफी कम हो गया है। यहां पर घराट घूमते थे और लोग गेहूं पीसते थे। मगर अब यहां पर 70 प्रतिशत पानी कम हो गया है।
ग्लोबल वार्मिंग का नतीजा: डॉ. सावंत
जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयन पर्यावरण एवं विकास संस्थान मौहल प्रभारी एवं वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एसएस सावंत कहते हैं कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेश्यिर लगातार पिघल रहे हैं। प्राकृतिक जलस्रोतों के यह मुख्य स्रोत है। प्रकृति से छेड़छाड़ के कारण वनों का आकार घट रहा है। समय पर बर्फबारी और बारिश न होने से प्राकृतिक स्रोत रिजार्च नहीं हो पा रहे हैं। पेड़ों को अधिक से अधिक संख्या में रोपित करना चाहिए। सरकार व सामाजिक संस्थाओं, पंचायत स्तर पर और महिला मंडल, युवा मंडल को भी सहयोग करना अति आवश्यक है।