अमर उजाला ब्यूरो
कुल्लू/खराहल। स्पर किस्म के सेब के पौधों की काट-छांट रॉयल और अन्य पुरानी किस्मों से भिन्न होती है। लिहाजा बागवानों को बागवानी विभाग के विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक काट-छांट का कार्य करना चाहिए। साथ ही इस कार्य को प्रशिक्षित व्यक्ति से करवाना चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि बागवान स्पर किस्मों में सही काट-छांट करता है तो महज तीन साल में ही करीब आधी पेटी सेब उत्पादन में सक्षम हो जाता है। स्पर पौधोें में दूसरे साल से लेकर चार साल तक उसके बीमों की बनने की प्रक्रिया और पौधों की बढ़ोतरी पर खास नजर रखने की जरूरत होती है। बागवान स्पर में दूसरे साल सैंपल देखने के लिए कुछ चुनिंदा बीमें रखकर बाकी बीमों को हटा दें। यह प्रक्रिया पौधे की तीन वर्ष की अवस्था तक होनी चाहिए। चौथे साल के बाद स्पर के पौधे में बढ़ोतरी और बीमों का सही अनुपात बनाना जरूरी है। ऐसे में बागवानों को गुणवत्तापूर्ण उत्पादन सुनिश्चित होगा। स्पर वैराटियों की प्रूनिंग प्रशिक्षित व्यक्ति और विशेषज्ञों की सलाह से करनी चाहिए। घाटी के बागवान अमित, रोशन लाल, चमन, कैलाश, सुरेश, अमन, प्रवीन, महेश शर्मा, प्रताप पठानिया, देवराज नेगी, अखिल ठाकुर आदि का कहना है कि स्पर किस्मों की कांट-छांट रॉयल और पुरानी किस्मों की तरह नहीं होती है। लिहाजा बागवानों को प्रशिक्षित व्यक्ति व विशेषज्ञों के परामर्श के मुताबिक इन किस्मों की कांट-छांट करनी चाहिए।
स्पर प्रजाति में 2 इंच में बीमें हटा दे तो फल का साइज छोटा होता है। अगर चार इंच में बीमों को हटाए तो फल का आकार मध्यम बनता है। अधिकतर बागवान स्पर प्रजाति के पौधों की काट-छांट करते समय 6 इंच में बीमें हटाते हैं तो फल बड़ा साइज का विकसित होता है। स्पर किस्मों की काट-छांट सामान्य रॉयल से एकदम भिन्न होती है। इस कार्य को करते समय विशेषज्ञों का परामर्श अवश्य लें।
-डॉ. आरके शर्मा, उपनिदेशक बागवानी विभाग कुल्लू