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भृगु ऋषि ने 70 साल बाद की देव वन परिक्रमा

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अमर उजाला ब्यूरो
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कुल्लू। देवभूमि में देवी-देवताओं सदियों पुरानी देव परंपराओं का निर्वहन आज भी हो रहा है। ऐसी ही एक परंपरा का निर्वहन भुंतर तहसील के अंतर्गत आने वाले ज्येष्ठा पंचायत के गांव आशणी में किया गया। जहां देवता भृगु ऋषि ने 70 साल के बाद अपने देव वन की परिक्रमा की। इस नजारे को देखने के लिए सैकड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।
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आशनी गांव के देवता भृगु ऋषि के मंदिर के चारों ओर सटे देवदार के वृक्षों वाले जंगल को देव वन कहा जाता है। इस जंगल से लकड़ी ले जाना निषेध है। देव परिक्रमा के अंदर वाली जगह को कोई भी व्यक्ति या वन विभाग अपना कब्जा नहीं कर सकता। आशनी गांव के बुजुर्ग तुले राम, वेद राम, हरिराम, दोत राम, परमानंद ने कहा कि यह परिक्रमा महर्षि भृगु ने लगभग 70 साल पहले की थी। माना जाता है कि इस मंदिर के चारों ओर सटे देवदार के वृक्षों के काटने या लोहा लगाने वालों को कुष्ठ रोग हो जाता है। इन पेड़ों के रक्षक स्थानीय देवता रंगू, जुंगरू को माना जाता है। फेरे के दौरान भृगु ऋषि की बहन मां चामुंडा, जमदग्नि ऋषि, रामसी व माता जोगणी आदि देवताओं के गूर भी मौजूद रहे। देवता के कारदार मानसुख, पुजारी लीलाधर, भृगु ऋषि के गुर खेमराज, देवता रंगू के गुर हरि राम, देवता जुंगरू के गुर मान चंद ने कहा कि हवाई, शियाह, नीणू, जेष्ठा आदि गांव के लोग इस ऐतिहासिक फेरे में शामिल हुए। देवता रंगू ने गूर के माध्यम से लोगों को चेतावनी दी कि इस रेखा के अंदर कोई व्यक्ति इन पेड़ों को काटेगा या लोहा लगाएगा तो परिणाम भुगतने को तैयार रहे। देवता रंगू वृक्षों की स्वयं रक्षा करेगा। फेरे के बाद महर्षि भृगु के मंदिर परिसर में ब्रह्मभोज का आयोजन किया गया। इसमें गांव के लोगों ने प्रसाद ग्रहण कर देवता से आशीर्वाद प्राप्त किया।
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