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तीर मारते ही अचानक मूर्छित हो गया नड़

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काहिका उत्सव - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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अमर उजाला ब्यूरो
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नग्गर (कुल्लू)। देवी-देवताओं की धरती कुल्लू में प्राचीन काल से आ रही परंपराओं का निर्वहन आज भी बखूबी किया जा रहा है। ऐसी ही एक परंपरा कुल्लू जिला के वाम तट मार्ग पर लंराकेलो गांव में काहिका उत्सव में निभाई गई। हर तीसरे साल मनाए जाने वाले इस काहिका उत्सव में रविवार को सैकड़ों श्रद्धालु दैवीय शक्ति के गवाह बने।
पहले नड़ को देवविधि से अचेत किया गया। इसके बाद देवी-देवताओं ने अपनी शक्ति से नड़ को जीवित भी कर दिया। इसके बाद महादेव की जयकार-जयकार हुई। ढोल-नगाड़ों, नरसिंगो की गूंज से पूरा क्षेत्र गूंज उठा। लंराकेलो गांव में लंराई महादेव के सम्मान में काहिका उत्सव मनाया गया। काहिका उत्सव में गांव दुआड़ा के विष्णु भगवान, नशाला गांव की माता चामुंडा, घुड़दौड़ के देवता गणेश, देवता वीरनाथ और अरछंडी की माता काली ओड़ी ने भी हारियानों के साथ शिरकत की। दोपहर बाद चार बजे के बाद नड़ अचेत करने की रस्स शुरू हुई। इस दौरान छिद्रा भी किया गया, वहीं नड़ को देवी-देवताओं के समक्ष पंचरत्न दिया गया। बकायदा नड़ को कफन भी ओढ़ाया गया। इसके बाद देवता की ओर से चुने एक विशेष व्यक्ति द्वारा तीर चलाया गया। तीर चलाते नड़ मूर्छित होकर जमीन पर गिर पड़ा। नड़ को जिंदा करने की मुहिम शुरू हुई। ढोल-नगाड़ों की थाप पर देवी-देवताओं के गूरों को देव खेल भी आई। लंबे इंतजार के बाद नड़ जिंदा हो गया। सैकड़ों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक पल के गवाह बने। नथान पंचायत प्रधान भगत राम, शंकर युवक मंडल के प्रधान रितूराज ने कहा कि देवी-देवताओं की उपस्थिति में रविवार को काहिका उत्सव देव विधि के अनुसार मनाया गया। लंराई महादेव के कारदार अर्जुन ने कहा कि देव आदेश पर क्षेत्र की सुख-समृद्धि व खुशहाली के लिए काहिका का आयोजन किया जाता है। काहिका करने के बाद सभी पाप खंडित हो जाते हैं। मान्यता है कि अगर काहिका उत्सव में नड़ जीवित नहीं होता है तो देवता के रथ की सारी संपत्ति नड़ की पत्नी को देनी पड़ती है।
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दरपौइण में रही काहिका उत्सव की धूम
कुल्लू। देवता जमदग्नि ऋषि के प्रांगण दरपौइण में काहिका उत्सव मनाया गया। शनिवार देर रात को दैवीय शक्तियों से नड़ अशोक कुमार मूर्छित होकर दोबारा जिंदा हो गया। उत्सव में ढालपुर के देवता गौहरी, नैना सेरी के वीर वराधी, लोट के वीर, दरपोईन की माता जोगणी ने भी शिरकत की। नड़ के मूर्छित होने के बाद देवताओं के हारियानों ने वाद्य यंत्रों की थाप पर मंदिर के चारों ओर तीन चक्कर लगाए। देवता के कारदार देवी सिंह ने जैसे ही चारों दिशाओं की ओर तीर मारे तो अशोक एकदम मूर्छित हो गया। उसके बाद दोबारा दैवीय शक्ति से उसे जिंदा कर दिया गया। सुख शांति के लिए इसे एक प्रकार से नरमेज्ञ यज्ञ का ही प्रतीक माना जाता है।
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