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माता जगन्नाथी मंदिर में उमड़ा आस्था का सैलाब

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खराहल (कुल्लू)। खराहल घाटी के गांव पूईद में मां जगन्नाथी भुवनेश्वरी के सम्मान में मनाए जाने वाले अष्टमी मेले में बुधवार को आस्था का सैलाब उमड़ा। ठीक एक साल के बाद इस देव कारज में माता और देवता नारायण ने देव परंपरा का निर्वहन किया।
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बुधवार को सूर्यास्त होने के पश्चात ढोल, नगाड़ों और नरसिंगों की मंगल ध्वनि के बीच देव विधि के अनुसार माता और देवता को निकाला गया। इसके बाद देवी और देवता ने मंदिर की परिक्रमा ढोल की थाप पर शुरू की। इसके पश्चात माता और देवता को सौह में लाया गया। जहां पर देवनृत्य गुरों के संग माता ने देव विधान से किया। यह क्रम संध्याकाल तक चला। माता के कारदार झाबे राम ठाकुर के अनुसार मेले के सुअवसर पर घाटी के दूरदराज गांवों के अलावा कुल्लू के विभिन्न इलाकों से सैकड़ों की तादाद में श्रद्धालु और हारियानों ने माता के मंदिर में पहुंचकर माथा टेका और सुख समृद्धि का आशीर्वाद मां से लिया। वहीं, कई श्रद्धालुओं ने मन्नतें पूरी होने पर माता को चुनरी भी भेंट की। ॉ
वीरवार को मंदिर में कुल्लवी नाटी देव परंपरा से डाली जाएगी। उधर, उझी घाटी के बरूआ, जगतसुख और हलाण की महिलाओं से परंपरागत गीतों के साथ कुल्लवी नृत्य सहित रंगारंग कार्यक्रम भी पेश कर वाहवाही लूटी। घराकड़ गांव के महेंद्र, चमन ठाकुर, पूईद के युवराज, जवाहर लाल शर्मा, ओम प्रकाश शर्मा आदि ने कहा कि मेले उपलक्ष्य में घाटी में परंपरागत व्यंजनों को भी मेहमानों को परोसा गया।
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सूर्यास्त के बाद ही निकलता है माता का रथ
भले ही कुल्लू के तमाम देवी-देवताओं के रथ देव कार्यवाही के लिए सुबह या सुूर्य उदय होने के समय ही अपने देवालय से निकलते है। लेकिन जगन्नाथी पूईद और माता भुनेश्वरी भेखली के रथ सूर्यास्त होने बाद ही निकलते हैं। माता के कारदार झाबे राम ठाकुर, पूईद पंचायत के पूर्व प्रधान उत्तम शर्मा का कहना है कि ऐसा माना जाता है कि माता जगन्नाथी कन्या के रूप में भेखली में प्रकट हुई थी। जहां पर माता हर शाम को चार खाने वाला खेल लड़कियों से खेलती थी। शाम को सब लड़कियां अपने घर जाती थीं। देवी हर रोज गायब हो जाती थीं। यह बात लड़कियों ने लोगों को बताई। लोगों ने छुपकर माता को देखा और कहा तू कौन है। तब माता ने कहा कि मैं देवी जगन्नाथी हूं और यहां पर स्थान लेना चाहती हूं। उसके बाद माता घराकड़ और पूईद के स्थान पर भी प्रकट हुईं। जहां माता के मंदिर का निर्माण हुआ है। माता बैसाख माह की अष्टमी के दिन शाम ढलते प्रकट हुई हैं। इस दिन माता का जन्म दिन मनाया जाता है। ऐसे में सदियों से ही दोनों माताओं के रथ सूर्यास्त होने के बाद ही देव नियम से निकलते हैं। आज भी माता चार खाने के खेल जैसा ही नृत्य करती हैं।
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