कुल्लू। जिला कुल्लू को प्राकृतिक आपदाओं के प्रति अलर्ट करने के लिए अब सेंसर स्थापित किए जाएंगे। जिससे घाटी में आपदा से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके। प्रथम चरण में जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने इसके लिए तीन जगहों को चिन्हित किया है। जिसमें रोहतांग भी शामिल है।
आपदा प्रबंधन द्वारा इस काम को पायलट प्रोजेक्ट के तहत किया जा रहा है। इसके लिए आईआईटी मंडी की मदद ली जा रही है। डीडीएमए कुल्लू ने तीन सेंसर का ऑर्डर भी आईआईटी मंडी को दे दिया है। लेकिन सेंसर की मांग अधिक होने से इसमें कुछ देरी हो सकती है। अगले मानूसन तक इन सेंसरों को स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। खासकर भूस्खलन व बाढ़ से अधिक प्रभावित जगहों पर इनको स्थापित किया जाएगा। जिससे लोगों को किसी आपदा आने से पहले इसका पता लग सकेगा। सेंसर रेड लाइट और आवाज से संबंधित क्षेत्र के लोगों को खतरे से सचेत करेगा। जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के मुख्य कार्यकारी अधिकारी एवं अतिरिक्त जिला दंडाधिकारी अक्षय सूद ने बताया कि इस दिशा पर पायलट प्रोजेक्ट के आधार पर प्राधिकरण का काम चल रहा है। आईआईटी मंडी से तीन सेंसर के लिए ऑर्डर कर दिया है। प्रथम चरण में तीन अति संवेदनशील जगहों के अलावा जिला में सेंसर की आवश्यकता कहां है, इस पर काम किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि इस साल सितंबर माह के अंत में भी कुल्लू जिला में भारी बाढ़ से करीब दो सौ करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है।
कुल्लू घाटी में बाढ़ को लेकर विदेशी वैज्ञानिक कर रहे शोध
घाटी में बाढ़ जैसी आपदा को कम करने के लिए जीबी पंत राष्ट्रीय हिमाचल पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान मौहल, क्रॉफ्ट फिल्म बंगलूरू, ब्रिटेन के बाथ स्पा विश्वविद्यालय और हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय संयुक्त रूप से जिला के फोजल नाले में इस पर शोध चल रहा है। इंग्लैंड की बाथ स्पा विश्वविद्यालय के डॉ. रिचर्ड जॉनसन की अगुवाई में वर्ष 2012 से शोध कार्य चल रहा है। इस नाले में 1994 को भंयकर बाढ़ आने से भारी तबाही मची थी। शोध में बाढ़ आने के कारणों की रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी।
सिस्मिक जोन पांच में आता है कुल्लू जिला
आपदा के लिहाज के जिला कुल्लू सबसे संवेदनशील है। जिला भूकंप, बाढ़, भूस्खलन, हिमस्खलन और आग जैसी आपदाओं की जद में आता है। सिस्मिक जोन पांच में होने से आपदा से सबसे अधिक तबाही होती है।