केलांग (लाहौल-स्पीति)। लाहौल-स्पीति में बारिश काफी कम होती है और कृषि और बागवानी के लिए सिंचाई की पूरी व्यवस्था ग्लेशियरों से पिघलने वाले पानी के साथ भूमिगत जल भंडारण टिकी है। ऐसे में बर्फबारी का नहीं होना घाटी में आगामी कृषि और बागवानी के लिए लोगों के लिए खतरा पैदा हो गया है।
हैरानी की बात है कि जो घाटी साल के चार महीनों तक बर्फ से लकदक रहती आई है आज बर्फ के लिए तरस गई है। फरवरी महीने में घाटी के खेत खलियान बिना बर्फ के सूखे पड़ गए हैं। अप्रैल महीने में घाटी में खेतीबाड़ी का काम शुरू होगा। घाटी में अभी तक बर्फबारी नहीं होने से मौसम विशेषज्ञों के साथ पर्यावरण प्रेमी भी हैरान है। बागवानी विभाग के डॉ. सोनम का कहना है कि फरवरी माह में भी अगर बर्फ नहीं गिरी तो लाहौल घाटी की कृषि और बागवानी चौपट हो जाएगा। घाटी में करीब एक हजार हेक्टेयर पर आलू की खेती हो रही है। जिसे देश के अलावा विदेशों में भी निर्यात किया जाता है। जबकि इससे करीब दो गुना भूमि पर मटर और अन्य सब्जियों की खेती होती है। वहीं, घाटी का एक बड़े हिस्से में सेब की पैदावार हो रही है। बर्फबारी नहीं होने से सेब के हजारों पेड़ सूख जाएंगे।
किसान अमर, दिनेश, कुलजीत, वीरेंद्र, राकेश, प्रेम, रोहित, टशी और दोरजे का कहना है कि बारिश नहीं होने से सिंचाई की पूरी व्यवस्था कूहलों और नहरों पर टिकी है। बर्फबारी ही नहीं हुई तो कूहलों में पानी कहां से आएगा। जबकि बर्फबारी नहीं होने से प्राकृतिक जलस्रोतों को भी खतरा पैदा हो गया है।
उधर, कृषि मंत्री डॉ. रामलाल मारकंडा का कहना है कि ऐसी स्थिति में सिंचाई के दूसरे विकल्पों को तलाशा जाएगा। चंद्रा-भागा नदी के अलावा अन्य नदी-नालों से उठाऊ सिंचाई योजना के जरिए पानी खेत खलियानों तक पहुंचाने की दिशा में पहल की जाएगी।