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हिमाचल में भव्य रथयात्रा के साथ कुल्लू दशहरा शुरू

Tue, 15 Oct 2013 08:38 AM IST
अमर उजाला,कुल्लू
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भगवान रघुनाथ की भव्य रथयात्रा के साथ ही अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा शुरू हो गया है। सोमवार को ढालपुर मैदान में रथयात्रा के दौरान देव-मानस के मिलन का अद्भुत नजारा देख लोग भाव-विभोर हो गए।
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सैकड़ों देवी-देवताओं के साथ रथयात्रा में हजारों की संख्या में लोग शामिल हुए। ‘भगवान रामचंद्र की जय’ उद्घोष से पूरी कुल्लू घाटी देवमयी हो गई।

स्थानीय लोगों के साथ देश-विदेश से आए सैकड़ों लोग इस देव समागम का गवाह बने।

रथयात्रा के बाद रघुनाथजी समेत उत्सव में शामिल हुए 206 देवी-देवता ढालपुर में बने अस्थायी शिविरों में चले गए हैं। जहां एक सप्ताह तक रहेंगे। देवताओं के साथ आए देवलु भी इन्हीं अस्थायी शिविरों में रहेंगे।

लोग इन्हीं शिविरों में आकर देवताओं के दर्शन करेंगे। रथयात्रा के दौरान हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एएम खानविलकर बतौर मुख्यातिथि उपस्थित रहे। देव समागम 20 अक्तूबर तक चलेगा।
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इस धार्मिक एवं सांस्कृतिक उत्सव में रंगारंग कार्यक्रम भी होंगे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों में देश के नामी कलाकारों के अलावा दस देशों के सांस्कृतिक दल भी भाग ले रहे हैं। इसके अलावा कई तरह प्रदर्शनियां लगाई गई हैं।

सोमवार को रथयात्रा से पूर्व उत्सव में शिरकत करने पहुंचे देवी-देवताओं ने रघुनाथ जी के दरबार में जाकर हाजिरी लगाई। मुख्य छड़ीबरदार महेश्वर सिंह की पूजा-अर्चना के बाद रथ यात्रा शुरू हुई। इस देव समागम का रहस्य जानने के लिए विदेशों से कई शोधकर्ता भी इस बार यहां पहुंचे हैं।

पुलिस के पहरे में रहे देवता
कुल्लू। धुर विवाद के चलते बंजार घाटी के देवता शृंगा ऋषि और बालूनाग इस वर्ष भी पुलिस के पहरे में रहे। प्रशासन की ओर से इन दोनों देवताओं को रथयात्रा में भाग नहीं लेने दिया गया। रथयात्रा में रघुनाथ जी के साथ चलने को लेकर वर्षों पुराना विवाद है।

करोड़ों के कारोबारों को सजा बाजार
कुल्लू। अंतरराष्ट्रीय दशहरा उत्सव के लिए ढालुपर में अस्थायी बाजार पूरी तरह से सज गया है। देश-विदेश से सैकड़ों व्यापारी यहां पहुंचे हैं। दावा है कि कुल्लू दशहरा में एशिया का सबसे बड़ा अस्थाई बाजार यहां लगता है।

450 वर्ष पूर्व शुरू हुआ था दशहरा
कुल्लू। प्रसिद्ध कुल्लू दशहरा उत्सव का इतिहास 450 वर्ष से अधिक पुराना है। इसका शुभारंभ सत्रहवीं सदी में कुल्लू के राजा जगत सिंह के शासनकाल में आरंभ हुआ था। 1951 में अयोध्या से रघुनाथजी, सीता माता और हनुमान की प्रतिमाएं यहां लाई गईं।

रघुनाथ जी के सम्मान में राजा जगत सिंह ने वर्ष 1660 में कुल्लू में दशहरे की परंपरा आरंभ की। तभी से भगवान रघुनाथ की अगुवाई में इस उत्सव को मनाया जाता है। कुल्लू घाटी के 365 देवी-देवता भगवान रघुनाथ जी को अपना ईष्ट मानते हैं।
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