नीलकंठ महादेव मंदिर हार में चल रही श्रीमद् भागवत कथा में उपस्थित संगत। स्रोत: आयोजक
परागपुर (कांगड़ा)। नीलकंठ महादेव मंदिर हार में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के दूसरे दिन पंडित सुमित शास्त्री ने संगत को कथा का रसपान कराया। उन्होंने बताया कि जब महर्षि वेदव्यास सरस्वती नदी के तट पर अपने आश्रम में ध्यान में थे। उन्होंने कलियुग के प्राणियों की दुराचारी और पापमय दशा का दर्शन किया तो उनकी आंखें सजल हो उठीं। दुखी मन से चिंतन करते हुए, देवऋषि नारद की प्रेरणा और भगवान गणपति के सहयोग से उन्होंने भागवत के चार श्लोकों को विस्तार देकर 18 हजार श्लोकों में रचा। इस दौरान पंडित शास्त्री ने भगवान श्रीकृष्ण की ओर से पांडवों और उत्तरा की रक्षा, कुंती के आदर्श चरित्र, भीष्म प्रसंग, राजा परीक्षित के जन्म और शमीक मुनि के पुत्र शृगी के दिए शाप की कथा का वर्णन किया। कथा में अश्वनी कुमार, मिंटू, मोनू, संजीव, पुण्या, रजनी, सपना और शामली सहित कई भक्तों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।