गुलेर (कांगड़ा)। कभी शाम ढलते ही हरिपुर की गलियों में रामलीला की खासी चहल-पहल रहती थी। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग चौगान की ओर उमड़ पड़ते थे। रोशनी से सजे मंच पर प्रभु राम, लक्ष्मण, सीता और हनुमान के किरदार जीवंत होते थे। पर्दा उठते ही पूरा मैदान ''जय श्रीराम'' के जयघोष से गूंज उठता था। आज गलियां और चौगान वही हैं, दशहरा भी आता है लेकिन रामलीला का मंच पिछले 15 वर्षों से पूरी तरह खामोश है।
हरिपुर में रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं थी। यह पूरे कस्बे को एक सूत्र में पिरोने वाला सामाजिक और सांस्कृतिक मंच था। घंटों बैठकर लोग मंचन देखते और आपसी मेलजोल बढ़ता था। आज बुजुर्ग उन दिनों को याद करते हैं, तो चेहरे पर मुस्कान के साथ एक कसक भी उभर आती है। उन्हें वे संवाद और कलाकार आज भी याद हैं। वहीं, नई पीढ़ी के लिए रामलीला अब टीवी और मोबाइल स्क्रीन तक ही सीमित रह गई है।
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यदि कुछ लोग पहल करें, पुराने कलाकारों को साथ जोड़ें और युवाओं को जिम्मेदारी सौंपें तो हरिपुर में फिर से मंच सज सकता है। रामलीला हमारी सांस्कृतिक पहचान और सामूहिकता की धरोहर है। -सुरेश धीमान, पूर्व आयोजक
हरिपुर में दशहरा पर्व के लिए लोगों में उत्साह बरकरार है। पर्व की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। कमेटियां व्यवस्थाओं और सजावट को अंतिम रूप दे रही हैं। बाजार में भी रौनक बढ़ने लगी है। -गगन गुलेरिया, सदस्य, दशहरा समिति