इंदौरा (कांगड़ा)। बरसात में आई भीषण बाढ़ के बाद किसानों की समस्याएं कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। बाढ़ की समस्या से जूझने के बाद अब किसानों को खेतों में बची हुई फसल को निकालना चुनौती बन गया है। बाढ़ ने सैकड़ों कनाल उपजाऊ भूमि को बहा दिया है। जो खेत बच गए हैं, उन पर दो फुट तक मोटी रेत की परत जम गई है। हालात ऐसे बन गए हैं कि अब किसानों के लिए खेतों तक ट्रैक्टर और ट्रक पहुंचाना भी किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं है।
क्षेत्र के किसानों का कहना है कि बाढ़ में जो गन्ने की फसल किसी तरह बच गई है, उसे खेतों से बाहर निकालना एक संघर्ष पूर्ण प्रक्रिया बन चुकी है। खेतों में जमी भारी मात्रा में रेत के कारण ट्रैक्टर और ट्रक बार-बार धंस रहे हैं। मजबूरी में किसानों को जेसीबी मशीन की मदद से ट्रकों को आगे-पीछे खींच कर रास्ता बनाना पड़ रहा है। किसान पहले जेसीबी मशीन से खेतों में जमी रेत हटा रहे हैं, उसके बाद ट्रैक्टर की मदद से रास्ता लेवल करवा रहे हैं। इसके बाद ही गन्ने से भरे ट्रक को खेतों तक ले जाने के लिए जेसीबी और ट्रैक्टर से जोड़कर पहुंचाया जा रहा है। इसके बावजूद ट्रक बार-बार रेत में धंसने से इसे निकालने में पूरा दिन बर्बाद हो रहा है। किसानों ने बताया कि इस पूरी प्रक्रिया में डीजल, जेसीबी और ट्रैक्टर का भारी खर्च उठाना पड़ रहा है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति और कमजोर हो गई है। खेतों में जितना गन्ना बचा है, वह रेत में दबा होने के कारण निकालने में उसकी लागत से कहीं अधिक खर्च वहन करना पड़ रहा है।
किसानों ने यह भी बताया कि रेत में दबने और पानी के तेज बहाव के कारण गन्ने में जगह-जगह मिट्टी लग गई है, जिससे गन्ना दोबारा अंकुरित हो गया है। इस कारण गन्ना काटने वाली लेबर गन्ने का छिलका उतारने से साफ इनकार कर रही है। अगर कोई लेबर छिलका उतारने के लिए तैयार होती भी है, तो वह पहले के मुकाबले दोगुनी मजदूरी की मांग कर रही है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है। किसानों का कहना है कि यदि गन्ना समय रहते खेतों से नहीं निकाला गया तो न तो खेतों की जुताई संभव होगी और न ही नई फसल की बुआई की जा सकेगी। इससे आने वाला सीजन भी पूरी तरह प्रभावित हो जाएगा। पीड़ित किसानों ने सरकार और प्रशासन से मांग की है कि बाढ़ से हुए इस भारी नुकसान को देखते हुए उन्हें जल्द उचित मुआवजा दिया जाए।
किसानों के बयान
खेतों में दो-दो फुट तक रेत जमा होने से गन्ना दब गया है और ट्रक का खेत तक पहुंचना बेहद कठिन है। पहले जेसीबी से रेत हटाकर और ट्रैक्टर से खेत समतल करने के बाद ट्रक को जेसीबी और ट्रैक्टर से खींचकर रास्ता बनाया जा रहा है। गन्ना लोड कर बाहर निकालने में इतना खर्च आ रहा है कि कमाई से ज्यादा लागत पड़ रही है।
- कुलविंद्र सिंह।
- बाढ़ के बाद गन्ने की कटाई का खर्च लगभग दोगुना हो गया है। पिछले वर्ष साफ गन्ने की कटाई पर लेबर 50 से 55 रुपये प्रति क्विंटल लेती थी, लेकिन बाढ़ के बाद मिट्टी लगे गन्ने की कटाई के लिए अब 80 से 90 रुपये प्रति क्विंटल तक वसूले जा रहे हैं। इससे किसानों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ गया है।
- दौलत पठानिया
- अब खेती करना बेहद महंगा हो गया है। खेतों में जमा रेत हटाए बिना खेत तैयार करना संभव नहीं है। खेतों से निकली रेत को बाहर ले जाकर बेचने की अनुमति नहीं है। ऐसे में किसान असमंजस में हैं कि आखिर करें तो क्या करें।
- सरदार जसविंद्र सिंह