बरियाल (कांगड़ा)। जवाली क्षेत्र की बासा पंचायत में पीढ़ियों से घर बनकर रहे सात अनुसूचित जाति के परिवार इस अब मूसलधार बारिश में खुले आसमान तले बेघर होकर दिन-रात गुजारने को मजबूर हैं। जवाली की सिविल कोर्ट के आदेश पर उनकी कच्चे घरों और सरकारी आवास योजनाओं के तहत बने पक्के घरों को गिरा दिया गया। बरसों पुराना बसेरा एक झटके में मलबे में तब्दील हो गया।
रजनी देवी, अपने बेटों साजन और कमल के साथ, भीगी जमीन पर बैठी कहती हैं कि हमने न केवल घर खो दिए, बल्कि हमारा सारा सामान, खाना और जरूरी कपड़े भी मलबे में दब गए। हमें घर खाली करने के लिए पर्याप्त समय तक नहीं दिया गया। पूर्णा देवी के पति का दो साल पहले निधन हो चुका है। अपने दृष्टिबाधित बेटे और बेटी के साथ दर्द साझा करते हुए कहती हैं कि हम जैसे-तैसे गुजारा कर रहे थे। सरकार की मदद से घर बना था, अब वह भी उजड़ गया। बारिश में बच्चों को संभालना सबसे मुश्किल हो गया है।
अन्य प्रभावित परिवारों का कहना है कि वे पीढ़ियों से यहां बसे थे, लेकिन गरीबी और कानूनी जानकारी के अभाव में अदालत के फैसले को चुनौती नहीं दे सके। उनका आरोप है कि उन्हें बेदखल करने के बाद न प्रशासन ने अस्थायी आश्रय दिया और न ही कोई राहत सामग्री। बेघर परिवारों ने राज्य सरकार और कृषि एवं पशुपालन मंत्री चंद्र कुमार से तुरंत राहत और पुनर्वास की गुहार लगाई है।
उधर, नगरोटा सूरियां के तहसीलदार ज्ञान चंद का कहना है कि अदालती आदेश पर घर हटाए गए हैं, ऐसे में पुनर्वास राहत देने का कोई प्रावधान नहीं है।
प्रभावितों का दावा- जमीन मालिक के पूर्वजों ने बसाया था
जवाली की सिविल कोर्ट ने हाल ही में जमीन के मालिक अशोक कुमार के पक्ष में फैसला सुनाया। अशोक कुमार ने अदालत में इस भूमि पर मालिकाना हक का दावा किया था। 15 साल तक कोर्ट में यह मामला चल रहा था। कोर्ट से फैसला आने के बाद शुक्रवार को घरों के बिजली के कनेक्शन काटे और शनिवार को पुलिस बल की मौजूदगी में प्रशासन ने जेसीबी मशीन चलवाकर घरों को गिरा दिया। हालांकि प्रभावित परिवारों का दावा है कि लगभग एक सदी पहले अशोक कुमार के पूर्वजों ने उनके पूर्वजों को यहां जमीन देकर बसाया था। अब यह सात परिवार हो गए हैं। घर टूटने के बाद ये सभी तिरपाल लगाकर टेंट में रहने को मजबूर हैं।