पत्नी को प्रताड़ित करने के मामले में पति की अपील खारिज
सत्र न्यायालय ने बरकरार रखा निचली अदालत का फैसला
पत्नी का तीन हजार रुपये भरण-पोषण देने के आदेश
संवाद न्यूज एजेंसी
धर्मशाला।
सत्र न्यायालय धर्मशाला ने पत्नी को घरेलू हिंसा का शिकार बनाने के मामले में पति की अपील खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि कमाई की क्षमता भी भरण-पोषण तय करने का आधार है।
न्यायालय ने निचली अदालत के उस फैसले को बरकरार रखा है, जिसमें पति को पत्नी को हर माह तीन हजार रुपये प्रति माह भरण-पोषण देने और मानसिक, शारीरिक व आर्थिक प्रताड़ना के लिए 20 हजार रुपये मुआवजा देने के आदेश दिए गए थे। साथ ही पति को पत्नी के साथ शारीरिक हिंसा नहीं करने और वैवाहिक घर में उसके रहने के अधिकार में बाधा नहीं डालने के निर्देश भी बरकरार रखे हैं।
सत्र न्यायाधीश अमन सूद की अदालत में कांगड़ा उपमंडल के अंतर्गत क्षेत्र के व्यक्ति ने ने अतिरिक्त मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी, न्यायालय-एक, कांगड़ा के 14 नवंबर 2025 के फैसले को चुनौती दी थी। पत्नी ने शिकायत में आरोप लगाया था कि पति शराब और नशे का सेवन कर उसके साथ मारपीट करता था। वह उसके चरित्र पर संदेह करने के साथ दहेज की मांग भी करता था। विरोध करने पर तलाक देने की धमकी देता था। 16 अगस्त 2021 को पिता के घर आयोजित एक कार्यक्रम में भी पति ने कथित तौर पर उसके साथ मारपीट की थी। इसके बाद से वह मायके में रह रही थी।
पति ने आरोपों को नकारते हुए दावा किया कि पत्नी अपनी मर्जी से ससुराल छोड़कर गई थी। उसने अपनी आय पांच हजार रुपये मासिक बताई और बीमार विधवा मां के भरण-पोषण की जिम्मेदारी का हवाला दिया। सत्र न्यायालय ने गवाहों के बयानों और निचली अदालत के अभिलेखों का अवलोकन करने के बाद पाया कि पत्नी और उसकी मां की गवाही को जिरह के दौरान कमजोर नहीं किया जा सका। अदालत ने कहा कि पति सक्षम व्यक्ति है और उसकी कमाई की क्षमता को भी भरण-पोषण तय करते समय ध्यान में रखा जाता है।
हिमाचल प्रदेश में अकुशल श्रमिक की 375 रुपये प्रतिदिन की न्यूनतम मजदूरी का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि पत्नी को दिया गया तीन हजार रुपये मासिक भरण-पोषण उसकी जरूरतों के लिए भी मुश्किल से पर्याप्त है। अदालत ने सभी तथ्यों को जांचने के बाद अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के सभी आदेश बरकरार रखे।