धर्मशाला। नगर निगम धर्मशाला में चुनाव का माहौल इस बार सिर्फ विकास के वादों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यारी-दोस्ती और रिश्तों की गर्माहट भी चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा बन गई है। चुनावी समर में विकास के बड़े मुद्दे अब पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और उम्मीदवारों ने मतदाताओं को रिझाने के लिए रिश्ता अभियान को ढाल बना लिया है।
पार्षद पद के लिए मैदान में उतरे उम्मीदवार अब घर-घर जाकर सिर्फ वोट ही नहीं मांग रहे, बल्कि पुराने रिश्तों की याद दिलाकर समर्थन जुटाने की कोशिश कर रहे हैं। भाई... मैंने नामांकन भरा है, एक वोट तो बनता है, इस तरह का संवाद इन दिनों हर वार्ड में आम सुनाई दे रहा है। उम्मीदवार अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और यहां तक कि दूर की जान-पहचान तक को फोन कर या व्यक्तिगत रूप से मिलकर समर्थन मांग रहे हैं।
चुनावी गलियारों में चर्चा है कि मुकाबला कड़ा होने के चलते उम्मीदवार कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहते। ऐसे में वे सोशल नेटवर्क, पुराने संपर्क और निजी संबंधों का पूरा लाभ उठाने में जुटे हैं। कई प्रत्याशी अपने स्कूल-कॉलेज के दोस्तों और पुराने सहकर्मियों से ‘आप हमारे अपने हैं’ जैसी भावनात्मक अपील कर रहे हैं।
निर्णायक साबित हो सकता है रिश्ता अभियान
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि नगर निगम जैसे छोटे स्तर के चुनावों में व्यक्तिगत संबंधों की भूमिका काफी अहम होती है। ऐसे में उम्मीदवारों का यह भावनात्मक दांव कई वार्डों में निर्णायक साबित हो सकता है। हालांकि मतदाता भी अब जागरूक हैं। वे व्यक्तिगत संबंधों के साथ-साथ उम्मीदवार के काम, छवि और भविष्य की योजनाओं को भी ध्यान में रखकर फैसला लेने की बात कह रहे हैं। कुल मिलाकर धर्मशाला की इस चुनावी जंग में अब नीति और नियत के साथ-साथ निजी संबंधों की भी परीक्षा हो रही है।