पालमपुर (कांगड़ा)। चौधरी सरवण कुमार हिमाचल प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर के प्रसार शिक्षा निदेशालय ने सितंबर के प्रथम पखवाड़े के लिए किसानों को कृषि परामर्श जारी किया है। इसमें धान, मक्का, मौसमी सब्जियों की काश्त, कीट प्रबंधन और घरेलू देखभाल को लेकर जरूरी तकनीकी सुझाव दिए गए हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, धान की फसल में रोपाई के 50-55 दिन बाद यानी बाली बनने की शुरुआती अवस्था में नाइट्रोजन की दूसरी व अंतिम खुराक टॉप ड्रेसिंग के रूप में डालें। अधिक उपज देने वाली उन्नत किस्मों के लिए 30 किलोग्राम और सुगंधित प्रजातियों के लिए 15 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करें। मक्का के खेतों में भारी बारिश के चलते जलभराव न होने दें और जल निकासी का पुख्ता प्रबंध करें। नर मंजरी आने और दाना दूधिया होने की अवस्था में सिंचाई का विशेष ध्यान रखें। भुट्टों की बाहरी पत्तियां सूखने और दाना सख्त होने पर ही मक्का की कटाई करें।
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सब्जियों की रोपाई, बिजाई और खाद प्रबंधन
फूलगोभी की रोपाई: निचले क्षेत्रों में पालम उपहार, इम्प्रूव्ड जैपनीज और मेघा किस्मों की तैयार पौध की रोपाई करें। अंतिम जुताई के समय प्रति हेक्टेयर 250 क्विंटल गोबर की खाद, 235 किलोग्राम इफको (12:32:16), 54 किलोग्राम म्यूरेट-ऑफ-पोटाश और 105 किलोग्राम यूरिया खेत में मिलाएं।
नर्सरी की तैयारी: फूलगोभी की पिछेती किस्मों (पूसा स्नोवॉल-16, के-1, केटी-25, पूसा सुभ्रा, संकर श्वेता, माधुरी, महारानी), बंदगोभी (प्राइड ऑफ इंडिया, गोल्डन एकड़, पूसा मुक्ता), गांठ गोभी (व्हाइट वियाना, पालम टेंडरनॉब), ब्रॉकली (पालम समृद्धि, पालम हरितिका) और चाइनीज बंदगोभी (पालमपुर ग्रीन) की नर्सरी तैयार करने का यह उपयुक्त समय है।
मटर की अगेती बिजाई: मध्यवर्ती क्षेत्रों में मटर की पालम त्रिलोकी, अरकल, वीएल-7 और मटर अगेता किस्मों की बिजाई 30×7.5 सेंटीमीटर की दूरी पर करें। खेत में प्रति हेक्टेयर 200 क्विंटल सड़ी गोबर खाद, 185 किलोग्राम इफको (12:32:16) और 50 किलोग्राम म्यूरेट-ऑफ-पोटाश डालें।
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फसल संरक्षण
पत्ता लपेट कीट: प्रारंभिक अवस्था में कीटग्रस्त पत्तों को काटकर नष्ट करें तथा मेड़ों से खरपतवार हटाएं। प्रकोप अधिक होने पर क्लोरपायरीफॉस 20 ईसी (2.5 मिली प्रति लीटर पानी) का छिड़काव करें।
तना छेदक कीट: कीट के हमले से बालियां सफेद होकर सूखने लगती हैं। यदि नुकसान 5 प्रतिशत से अधिक दिखे, तो लैम्ब्डा साइहलोथ्रिन (0.8 मिली प्रति लीटर पानी) का घोल बनाकर फसल पर छिड़कें।