धर्मशाला। ममता जब सामाजिक संकल्प बन जाए तो वह सैकड़ों जिंदगियों के लिए उम्मीद की नई किरण बन जाती है। जिले के रैहन (छत्र) की 44 वर्षीय अल्का शर्मा ने दिव्यांग बेटे की पीड़ा को सेवा के मार्ग में बदलकर अन्य दिव्यांग बच्चों के लिए मसीहा की भूमिका निभाई है। एक दशक से दिव्यांग बच्चों की सेवा में जुटीं अल्का के प्रयासों से अब तक 170 के करीब विशेष बच्चे पंजीकृत हो चुके हैं। इनमें से 30 बच्चे स्वस्थ होकर नियमित स्कूलों में पढ़ाई करने लगे हैं। करीब 40 बच्चों का आश्रम में नियमित उपचार व पुनर्वास चल रहा है।
अल्का बताती हैं कि उनके बेटे आयान का जन्म 16 अगस्त 2010 को हुआ था और वह बचपन से ही दिव्यांग था। उस समय क्षेत्र में थेरेपी व विशेष देखभाल की सुविधा न होने के कारण उन्हें बच्चे के उपचार के लिए बार-बार पठानकोट जाना पड़ता था। उन्होंने पति नीरज शर्मा के साथ मिलकर निर्णय लिया कि वे घर के पास ही ऐसा केंद्र शुरू करेंगे ताकि किसी अन्य दिव्यांग बच्चे और माता-पिता को पीड़ा न झेलनी पड़े।
गहने बेचे, पति की 90 फीसदी कमाई लगाई, एक करोड़ से खड़ा किया आश्रम
अल्का ने 2017 में घर से ही दिव्यांग बच्चों की देखभाल और थेरेपी का काम शुरू किया था। दो वर्ष पूर्व बेटे आयान का निधन होने के बाद भी उनका हौसला नहीं टूटा। उन्होंने भरमाड़ में पांच कनाल भूमि पर एक करोड़ रुपये से अधिक की लागत से दिव्यांग बच्चों के लिए एक आधुनिक आश्रम का निर्माण किया है। इस कार्य के लिए अल्का ने सोने के गहने तक बेच दिए। उनके पति नीरज शर्मा, जो एक फार्मा कंपनी में कार्यरत हैं, ने भी 90 प्रतिशत तक आय आश्रम निर्माण में लगा दी। वर्तमान में भी परिवार मासिक आय का 50 प्रतिशत हिस्सा इन बच्चों की देखभाल पर खर्च करता है। इसके अलावा स्थानीय दानी सज्जनों और स्कूलों से भी सहयोग मिला। आश्रम में बच्चों के लिए आधुनिक फिजियोथेरेपी, वातानुकूलित कमरे, हीटर, खेल मैदान, मंदिर और पौष्टिक खान-पान की बेहतरीन सुविधाएं उपलब्ध हैं। 13 समर्पित कर्मियों का स्टाफ है।
नौकरी छोड़ी, ताने सहे मगर नहीं मानी हार
अल्का पूर्व में रैहन की एक पैथोलॉजी लैब में कार्यरत थीं लेकिन बेटे व अन्य दिव्यांग बच्चों की खातिर उन्होंने नौकरी छोड़ दी। शुरुआत में कुछ ग्रामीणों ने अंधविश्वास के चलते दिव्यांग बच्चों की संगति से अन्य बच्चों पर असर पड़ने जैसी संकीर्ण बातें कहकर हतोत्साहित करने का प्रयास किया।
अगर कोई व्यक्ति समाज के लिए अच्छा कार्य करना चाहता है तो उसकी राह में रोड़े अटकाने के बजाय उसका सहयोग करना चाहिए। कोई भी इंसान दुनिया से धन-दौलत साथ लेकर नहीं जाता, इंसानियत और सेवा ही स्थायी धरोहर हैं। -अल्का शर्मा, समाज सेविका
दिव्यांग बच्चों के साथ रैहन की अल्का। स्रोत: स्वयं