ेअमर उजाला ब्यूरो
धर्मशाला। पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर से देश में रह रहे विस्थापित प्रधानमंत्री तक बन गए, फिर भी 70 साल से उन्हें अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। यह बात केंद्रीय विश्वविद्यालय धर्मशाला के धौलाधार परिसर में ललितादित्य व्याख्यामाला की कार्यशाला के मुख्य वक्ता डॉ. अजय शर्मा ने कही। शनिवार को जम्मू-कश्मीर के विस्थापित और मानवाधिकार विषय पर कार्यशाला का आयोजन किया गया।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में जम्मू-कश्मीर में लगभग 12 लाख लोग ऐसे हैं, जो अपने ही प्रदेश में विस्थापित हैं। इसमें पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर, पश्चिम पाकिस्तान, कश्मीरी पंडित सहित चंप और पंजाब के बाल्मीकि समुदाय के लोग हैं, जिनके पास जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवासी प्रमाण पत्र नहीं है। पिछले 70 साल से उपरोक्त लोग जम्मू-कश्मीर में हर व्यक्ति स्थायी निवासी प्रमाण पत्र के लिए संघर्ष कर रहा है। स्थायी निवासी प्रमाण पत्र न होने के कारण आज भी ये लोग जम्मू-कश्मीर की विधानसभा और पंचायत चुनावों में मतदान नहीं करते हैं। ये लोग सिर्फ लोकसभा चुनाव में वोट करते हैं। वहीं, दूसरी ओर उपरोक्त पश्चिम पाकिस्तान से जम्मू-कश्मीर के बजाय देश के दूसरे राज्य में जाकर बसे मनमोहन सिंह, इंद्र कुमार गुजराल और लाल कृष्ण अडवानी देश के प्रधानमंत्री और उपप्रधानमंत्री बन गए। फिर भी इन लोगों के अधिकारों के बारे में किसी भी सरकार ने नहीं सोचा। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर की सरकार को अभी तक यह भी जानकारी नहीं है कि प्रदेश में कितने विस्थापित लोग रह रहे हैं। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र पिछले 10 सालों से विस्थापितों और जम्मू-कश्मीर के इतिहास को देश के सामने लाने के लिए कार्य कर रहा हैं। इसमें केंद्र को सफलता मिली है। कार्यशाला में व्याख्यानमाला के संयोजक डॉ. जेपी सिंह, प्रो. सतीश गंजू, प्रो. बीसी चौहान, प्रो विवेक शर्मा सहित विश्वविद्यालय के विद्यार्थी मौजूद रहे।