अमर उजाला ब्यूरो
धर्मशाला। हिमालय नीति अभियान के निदेशक कुलभूषण उपमन्यु ने कहा कि हिमालय का अस्तित्व न हो तो भारत में सहिष्णुता और विविधता की कल्पना नहीं की जा सकती। हिमालय अपने देश का प्राकृतिक प्रहरी ही नहीं, सांस्कृतिक दृष्टि से भी भारत की संस्कृति पर हिमालय की गहरी छाप दिखती है। आज जब असहिष्णुता पर चर्चा बढ़ गई है और विविधता पर खतरा मंडरा रहा है, तब हिमालय हमारे लिए ओर भी महत्वपूर्ण हो गया है।
शनिवार को केंद्रीय विश्वविद्यालय के धौलाधार कैंपस में आयोजित सम्राट ललितादित्य व्याख्यान माला में बतौर मुख्य वक्ता आए पर्यावरण विद कुलभूषण उपमन्यु ने कहा कि भारती समाज से जातिगत विद्यवेश को हटाना सबसे बड़ी आवश्यकता है। हिमालय का संदेश यही है कि जो संस्कृति पहाड़ को देवात्मा कह सकती है। वह किसी मनुष्य को जाति के नाम पर तिरस्कृत कैसे कर सकती है। हिमालय के सांस्कृतिक अवदान पर चर्चा करते हुए कहा कि अब तक इस दिशा में बहुत कम शोध हुए हैं। हम एक ऐसे दौर में हैं, जब पहचान का संकट बढ़ता जा रहा है। हिमालय पर अधिक से अधिक शोध कर हम पहचान के संकट से उभर सकते हैं। विकास के नाम पर हिमालय का अत्यधिक दोहन करना देश की संस्कृति के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। सीयू के विद्यार्थियों और शोधार्थियों से इस विषय पर सही दिशा में शोध करने का आह्वान किया ताकि आने वाली पीढ़ी को सांस्कृतिक और जैविक विविधता उपलब्ध हो सके। इस मौके पर व्याख्यानमाला के संयोजक डॉ. जय प्रकाश सिंह, डॉ. कुलदीप शुक्ला सहित अन्य शोधार्थी एवं विद्यार्थी मौजूद रहे।