मामले में अजय पाल, अशोक शर्मा, यौवनलता, सुनील कुमार, रमेश शर्मा और सुरेश परमार को आरोपी बनाया गया है। इनमें सोसायटी के तत्कालीन सचिव के अलावा सहकारिता विभाग और अंकेक्षण व्यवस्था से जुड़े अधिकारी शामिल हैं। आरोप है कि संबंधित अंकेक्षण अधिकारियों ने सोसायटी के अभिलेखों का बैंक रिकॉर्ड से आवश्यक भौतिक सत्यापन नहीं किया और जाली दस्तावेजों के आधार पर अंकेक्षण रिपोर्ट तैयार की। विजिलेंस ने आरोपियों के खिलाफ धारा 406, 420, 467, 468, 471 और 120-बी आईपीसी तथा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 13(1)(डी) सहपठित धारा 13(2) के तहत मामला दर्ज किया है।
विजिलेंस की जांच वर्ष 2011-12 से 2023-24 तक सोसायटी में जमा राशि और एफडीआर से संबंधित रिकॉर्ड पर केंद्रित रही। सोसायटी के रिकॉर्ड में दर्ज एफडीआर की संख्या और राशि का बैंकों के वास्तविक रिकॉर्ड से मिलान करने पर गंभीर वित्तीय अनियमितताएं सामने आईं। जांच रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2023-24 में सोसायटी के रिकॉर्ड में 5,17,62,690 रुपये की एफडीआर दर्ज थी, जबकि बैंक रिकॉर्ड में केवल 2,71,07,020 रुपये की एफडीआर का मिलान हुआ। इस तरह 2,46,55,670 रुपये का अंतर सामने आया, जिसे जांच रिपोर्ट में गबन या दुरुपयोग से जुड़ा बताया गया है।
जांच के दौरान रोकड़वही में नकद शेष और अमानत वापसी से संबंधित प्रविष्टियों की भी जांच की गई। रिपोर्ट के अनुसार इनका उचित रिकॉर्ड नहीं मिलने पर 72,35,768 रुपये की अतिरिक्त राशि सचिव से प्राप्तव्य पाई गई। इस राशि पर 24,65,567 रुपये ब्याज देय होने का भी उल्लेख है। जांच रिपोर्ट में सोसायटी को कुल 2,32,52,311 रुपये की शुद्ध वित्तीय हानि होने की बात कही गई है। हालांकि, एफआईआर में दर्ज विभिन्न आंकड़ों के आधार पर इस शुद्ध हानि की गणना स्पष्ट नहीं है। विजिलेंस के अनुसार एफडीआर प्रमाण-पत्रों पर लगी बैंक शाखा की मोहर और हस्ताक्षर भी वास्तविक बैंक अभिलेखों से मेल नहीं खाते पाए गए। आरोप है कि बैंक की जाली मोहर तैयार कर जाली एफडीआर और अन्य दस्तावेज बनाए गए और उनका वास्तविक दस्तावेजों के रूप में इस्तेमाल किया गया।