राज्य सरकार का यह साहसिक आर्थिक प्रयोग औद्योगिक भांग की खेती को वैध और नियमित कर हिमाचल की अर्थव्यवस्था को वैश्विक बायो इकॉनोमी में अग्रणी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम है। सरकार के प्रवक्ता की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार दशकों से कुल्लू, मंडी और चंबा जैसी घाटियों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली भांग को अब तक केवल नशे और अवैध व्यापार से जोड़कर देखा जाता था। प्रदेश सरकार ने औषधीय गुणों से युक्त इस संपदा को बहुमूल्य औद्योगिक संसाधन के रूप में पहचाना है। इसका उपयोग पर्यावरण के अनुकूल कपड़ा उद्योग, पेपर व पैकेजिंग, कॉस्मेटिक, बॉयो फ्यूल, एनर्जी इंडस्ट्री में करने के साथ-साथ इससे बायो प्लास्टिक जैसे उत्पाद भी तैयार किए जा सकेंगे। इस नीति का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि औद्योगिक उपयोग के लिए उगाई जाने वाली भांग में टेट्राहाइड्रोकैनाबिनोल टीएचसी की मात्रा 0.3 प्रतिशत से कम रखी जाएगी।
राजस्व के अलावा किसानों के लिए वरदान : सुक्खू
मुख्यमंत्री सुक्खू ने कहा कि 24 जनवरी को कैबिनेट ने भांग की नियंत्रित खेती के पायलट अध्ययन प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है। कृषि विश्वविद्यालय पालमपुर और औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय नौणी, सोलन को उच्च उपज और कम टीएचसी वाले बीजों को विकसित करने की जिम्मेदारी सौंपी है। इस संबंध में राजस्व मंत्री जगत सिंह नेगी की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गई। कमेटी ने उत्तराखंड के डोईवाला और मध्य प्रदेश में की जा रही खेती का अध्ययन कर रिपोर्ट सरकार को सौंपी है। यह पहल राजस्व वृद्धि और किसानों के लिए वरदान होगी।
सरकार नशे को नहीं, उद्योग को बढ़ावा दे रही
सरकार का लक्ष्य प्रदेश को पर्यावरण के अनुकूल निर्माण सामग्री, विशेष वस्त्रों और आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण केंद्र के रूप में विकसित करना है। इससे न केवल वर्ष 2032 तक हिमाचल को देश का सबसे समृद्ध राज्य बनाने का मार्ग प्रशस्त होगा, बल्कि युवाओं के लिए नए स्टार्टअप और रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। मुख्यमंत्री सुक्खू ने स्पष्ट किया है कि सरकार नशे को नहीं, बल्कि उद्योग को बढ़ावा दे रही है।