न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने मुख्य अभियंता नरेंद्र पाल सिंह चौहान की याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि किसी एक अधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी पद पर बनाए रखने से छह से सात योग्य अधिकारियों की पदोन्नति प्रभावित होती है। इससे प्रशासनिक व्यवस्था और कर्मचारियों के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ता है। अदालत ने टिप्पणी की कि सेवा विस्तार का प्रस्ताव नियमानुसार विभाग के निचले स्तर से आना चाहिए था, लेकिन इस मामले में मुख्यमंत्री कार्यालय के निर्देश पर फाइल ऊपर से नीचे भेजी गई। यह प्रक्रिया मनमानी और नियमों के विपरीत थी। खंडपीठ ने कहा कि केवल जनहित शब्द लिख देने भर से कोई फैसला जनहित का नहीं हो जाता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई साक्ष्य या दस्तावेज नहीं मिला, जिससे साबित हो कि सेवा विस्तार किन असाधारण परिस्थितियों में दिया गया।
सरकार ने अपने ही आदेश की अनदेखी की: कोर्ट
सेवा विस्तार के पक्ष में सरकार ने दलील दी थी कि विभाग में इस पद के लिए कोई उपयुक्त उत्तराधिकारी उपलब्ध नहीं था। हालांकि, याचिकाकर्ता समेत तीन अन्य मुख्य अभियंता पदोन्नति के लिए योग्य थे। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य सरकार ने सात अप्रैल 2026 को लिखित निर्देश जारी कर सेवानिवृत्त कर्मचारियों को सेवा विस्तार या पुनर्नियोजन नहीं देने का फैसला लिया था। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी को विस्तार दिया गया। हाईकोर्ट ने पुराने फैसलों और हैंडबुक ऑफ पर्सनेल मैटर्स का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि सेवा विस्तार केवल अत्यंत दुर्लभ और असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखकर दिया जा सकता है, न कि राजनीतिक या व्यक्तिगत प्रभाव के आधार पर।