अदालत ने फैसला दिया कि शिक्षक जब आठ साल के थे तब उन्हें अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र दिया। तत्कालीन तहसीलदार ने अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि उन्होंने इसे संविधान (अनुसूचित जनजाति) आदेश 1950 और अनुसूचित जनजाति एवं अनुसूचित जाति सूची (संशोधन) 1965 और हिमाचल प्रदेश अधिनियम 1970 के तहत जारी किया है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 (25) के तहत अनुसूचित जनजाति की परिभाषा के अनुसार ऐसी कोई विशिष्ट परिभाषा नहीं है कि आदिवासी महिलाओं के बच्चे को आदिवासी नहीं माना जा सकता। अभियोजन पक्ष ने ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया है। अदालत ने रमेश भाई नाकिया बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य शीर्षक से मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए यह भी टिप्पणी की है कि आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच हुए विवाह, पैदा हुआ बच्चा यह साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र है कि उसका पालन-पोषण उसकी मां ने किया था जो अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति से संबंधित थी।
शिक्षक ने कहा कि उनकी मां का जन्म अनुसूचित जनजाति में हुआ। उसका जन्म भी किन्नौर में हुआ। मां ने पालन पोषण भी आदिवासी रीति-रिवाजों से किया। पांचवीं तक की शिक्षा भी किन्नौर में प्राप्त की। परिवार के पास किन्नौर में जमीन जायदाद है। उसने कभी भी अनुसूचित जनजाति प्रमाण पत्र के लिए आवेदन नहीं किया। यह प्रमाण पत्र 1981 को जारी किया गया था। उन्होंने जांच अधिकारी के पास स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रमाण पत्र असली है। उन्होंने यह प्रमाण पत्र हलका पटवारी और प्रधान की रिपोर्ट के आधार पर जारी किया।