कब कितनी घटी बर्फबारी
उपग्रह डाटा का विश्लेषण करने पर रावी बेसिन पर सबसे अधिक 22.42% कम बर्फबारी आंकी गई है। 2021-22 मेंं 2096.48 वर्ग किलोमीटर और 2022-23 में यह 1626.46 वर्ग किलोमीटर रह गया। सतलुज बेसिन में 2021-22 में 11398.81 के मुकाबले 2022-23 में 9733.77 वर्ग किलोमीटर रह गया। ब्यास में 2021-22 में 2391.49 से 2022-23 में घटकर 2226.20 वर्ग किमी रहा। चिनाब बेसिन में सबसे कम 0.39 की कमी दर्ज हुई। 2021-22 के 7357.22 से 2022-23 में 7328.86 वर्ग किमी दायरे में बर्फबारी हुई। चारों बेसिन का कुल औसत क्षेत्र 2021-22 में 23244 वर्ग किलोमीटर था, जो 2022-23 में घटकर 20915.29 वर्ग किलोमीटर रह गया।
लाहौल, किन्नौर में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने के लिए जगह चिह्नित
ग्लेश्यिरों और झीलों के टूटने की स्थिति में बाढ़ से बचाव के लिए किन्नौर, कुल्लू और लाहौल-स्पीति में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगेंगे। तीनों जिलों के उपायुक्तों को सारी स्थितियों का आकलन करने और स्थान चिह्नित करने के लिए कहा गया था। लाहौल-स्पीति के उपायुक्त राहुल कुमार ने बताया कि विभिन्न विभागों की एक संयुक्त टीम ने इसका निरीक्षण कर रिपोर्ट भेज दी है। लाहौल-स्पीति के घेपन पीक में इसके लिए जगह चिह्नित की गई है। वहीं, किन्नौर में सांगला धार में अर्ली वार्निंग सिस्टम लगेगा। कुल्लू जिला में भी जगह चिह्नित की जा रही है।
ग्लोबल वार्मिंग के कारण तापमान लगातार बढ़ रहा है। ग्लेशियर सिकुड़ रहे हैं। सतलुज बेसिन पर झीलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सतलुज बेसिन में 2021 के मुकाबले 2022 में 321 नई झीलें बनी हैं। हालांकि, इन झीलों से अभी किसी तरह का खतरा नहीं है - डॉ. एसएस रंधावा, मुख्य वैज्ञानिक अधिकारी, हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद
ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग का असर पड़ रहा है। इसका मुख्य कारण जंगलों में आग लगने से कार्बन अधिक मात्रा में उत्पन्न हो रही है। इसके अलावा पर्यटन स्थलों में क्षमता के अधिक पर्यटक वाहनों के आने और हवा के वायु प्रदूषण इसके कारण हैं - जेसी कुनियाल, वरिष्ठ वैज्ञानिक जीबी पंत राष्ट्रीय हिमालयी पर्यावरण एवं सतत विकास संस्थान अल्मोड़ा, उत्तराखंड