बिक्रम ठाकुर ने आरोप लगाया कि सरकार ने पंचायतों की वित्तीय और प्रशासकीय शक्तियां समाप्त कर दी हैं। अब ग्राम सभा के निर्णयों को दरकिनार कर अधिकारियों को यह अधिकार दे दिया गया है कि वे तय करें कौन बीपीएल सूची में होगा। पंचायत फंड के ब्याज को वापिस लेना, अनस्पेंट राशि पर तीन दिनों के भीतर रिवर्सल का आदेश देना और संपत्ति कर की आय भी छीन लेना ये सब दर्शाते हैं कि सरकार पंचायतों को पूरी तरह से कमजोर करना चाहती है। उन्होंने कहा, 'पंचायत प्रधान अब नल-जल मित्रों की ट्रेनिंग फीस भरें, कांगड़ा महोत्सव के नाम पर चंदा दें, और फिर भी विकास के नाम पर सरकार से ठोकरें खाएं।'
बिक्रम ठाकुर ने याद दिलाया कि चुनावों के दौरान मुख्यमंत्री ने जिला परिषद कर्मचारियों के विभागीय मर्जर को जायज बताया था और कहा था कि यह केवल एक “छोटी विसंगति” है। लेकिन ढाई साल बीत जाने के बावजूद न तो मर्जर हुआ और न ही सितंबर 2022 के बाद कोई नियमितिकरण। एनपीएस कर्मचारियों को केंद्र के समान डीए देने की अधिसूचना तो जारी हुई, लेकिन जिला परिषद के कर्मचारियों को इससे भी वंचित कर दिया गया।
उन्होंने कहा कि राज्य की ग्राम पंचायतों में तैनात ग्राम रोजगार सेवकों को पिछले तीन महीनों से वेतन नहीं मिला है। सिलाई अध्यापिकाएं, पंचायत चौकीदार और अन्य मानदेयी कर्मचारी भी बीते पांच महीनों से भुगतान के इंतजार में हैं। चौकीदारों के लगभग 900 पद रिक्त हैं, जिन्हें भरने की कोई प्रक्रिया सरकार ने नहीं चलाई। जिन चौकीदारों ने 10 वर्ष का कार्यकाल पूरा कर लिया, उन्हें दैनिक वेतन भोगी तक नहीं बनाया जा रहा।
'प्रधान को खुद चौकीदार का काम करना पड़ रहा'
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि आज प्रधान को खुद चौकीदार का काम करना पड़ रहा है इससे ज्यादा शर्मनाक स्थिति पंचायती राज व्यवस्था की कभी नहीं रही। पंचायतों में विकास कार्यों को ई-टेंडरिंग के माध्यम से करवाने की अधिसूचना सरकार को भारी विरोध के चलते वापस लेनी पड़ी, लेकिन बाद में सरकार ने बीडीओ स्तर पर टेंडर कराने का फरमान जारी किया, जिसे भी प्रधानों के दबाव में हटाना पड़ा। फिर भी पेवर ब्लॉक जैसी वस्तुओं की खरीद पर नियंत्रण सरकार ने अपने पास रखा है, ताकि अपने चहेते सप्लायर्स को लाभ पहुंचाया जा सके।
'पानी के बिल और HRTC किराए में बढ़ोतरी जनता की जेब पर डाका'
बिक्रम ठाकुर ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में पानी के बिल न वसूलने की घोषणा के बावजूद सरकार ने चुपचाप फिर से वसूली शुरू कर दी है। ₹100 प्रति माह की दर से बिल वसूलने के लिए प्रधानों को अधिकृत करना जनता और प्रधानों के बीच टकराव पैदा करने की साजिश है। उन्होंने एचआरटीसी के किराया बढ़ोतरी की भी आलोचना की। ₹5 की जगह अब ₹10 न्यूनतम किराया कर दिया गया है। 'नारी को नमन' योजना, जिसमें महिलाओं को 50% किराया छूट मिलती थी, उसे अब शहरी क्षेत्रों में बंद करने की योजना है यह महिला सशक्तिकरण के नाम पर एक धोखा है। 45,000 से अधिक बिजली मीटर ऐसे घरों में लगाए गए जिनके पास भवन निर्माण की एनओसी नहीं है। अब इनसे न केवल चालू बिल, बल्कि पहले के एरियर भी वसूले जा रहे हैं। यह स्पष्ट रूप से नियमों का उल्लंघन है और आम जनता पर आर्थिक बोझ है।
'चमियाणा अस्पताल: न दवा, न बस, न सुविधा'
शिमला के पास शुरू किया गया सुपर स्पेशलिटी अस्पताल बिना तैयारी के शुरू कर दिया गया। मरीजों को न तो हिमकेयर योजना का लाभ मिल रहा है, न ही दवाएं गुणवत्तायुक्त हैं। पर्ची शुल्क ₹10 तक लेना गरीबों पर अन्याय है। अस्पताल तक पहुंचने के लिए कोई सरकारी बस सेवा नहीं है और सड़कों की हालत इतनी खराब है कि मरीजों को आपातकाल में भी राहत नहीं मिलती।