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हिमाचल हाईकोर्ट: अनुकंपा पर नौकरी वंशानुगत अधिकार नहीं, 22 साल के बाद नियुक्ति की मांग खारिज

Tue, 08 Sep 2026 06:30 AM IST
Krishan Singh भारती मेहता, संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

 हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति न तो वंशानुगत अधिकार है और न ही सरकारी भर्ती का नियमित स्रोत। इसका उद्देश्य कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को उत्पन्न हुए तत्काल वित्तीय संकट से उबारना है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अनुकंपा नियुक्ति न तो वंशानुगत अधिकार है और न ही सरकारी भर्ती का नियमित स्रोत। इसका उद्देश्य कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार को उत्पन्न हुए तत्काल वित्तीय संकट से उबारना है। अदालत ने पिता की मृत्यु के 22 साल बाद अनुकंपा नियुक्ति की मांग करने वाली याचिका को खारिज कर दिया। न्यायाधीश रंजन शर्मा की अदालत ने कहा कि यदि परिवार ने लंबे समय तक अपनी आजीविका का प्रबंध कर लिया है तो अनुकंपा नियुक्ति का आधार बनने वाला तत्काल आर्थिक संकट समाप्त माना जाएगा। अदालत ने राज्य सरकार के याचिका खारिज करने के फैसले को कानून के अनुरूप ठहराया।

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मामले के अनुसार, याचिकाकर्ता राकेश कुमार के पिता लेख राम शास्त्री कुल्लू जिले के प्राथमिक स्कूल कपाह (बंजार) में 22 जुलाई 1988 से तदर्थ आधार पर जेबीटी शिक्षक के रूप में कार्यरत थे। सेवा के दौरान 24 जुलाई 1995 को उनका निधन हो गया। याचिकाकर्ता की मां मीरा देवी ने 1998 और 1999 में अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया, जिन्हें सरकार ने क्रमश: 23 मई 1998 और 16 जनवरी 1999 को खारिज कर दिया। इसके बाद वर्ष 2017 में पिता की मृत्यु के करीब 22 साल बाद राकेश कुमार ने अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया। मामला लंबित रहने पर उन्होंने प्रशासनिक न्यायाधिकरण का रुख किया। वर्ष 2020 में मामला हाईकोर्ट को स्थानांतरित हो गया। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की 18 जनवरी 1990 की नीति के तहत केवल नियमित कर्मचारियों के आश्रित ही अनुकंपा नियुक्ति के पात्र हैं, तदर्थ कर्मचारियों के नहीं।

 

तीन साल में करना था आवेदन
नीति के क्लॉज 8 के अनुसार अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन कर्मचारी की मृत्यु के तीन साल के भीतर किया जाना चाहिए। नाबालिग बच्चे के मामले में उसे बालिग होने तक निर्धारित अवधि की छूट दी जाती है। अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता वर्ष 2003 में बालिग हो गया था और वर्ष 2007 तक आवेदन की समय सीमा समाप्त हो चुकी थी। ऐसे में 2017 में किया गया आवेदन स्पष्ट रूप से समय बाधित था। हाईकोर्ट ने नीति के क्लॉज 5(सी) का हवाला देते हुए कहा कि यदि परिवार का एक सदस्य पहले से सरकार, बोर्ड या निगम में कार्यरत है तो दूसरे या तीसरे सदस्य को अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति नहीं दी जा सकती।

सिर पर हथौड़े से जानलेवा हमला करने के आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज
 प्रदेश हाईकोर्ट ने सिर पर हथौड़े से जानलेवा हमला करने के आरोपी की नियमित जमानत याचिका को खारिज कर दिया। न्यायाधीश राकेश कैंथला ने स्पष्ट किया कि बिना परिस्थितियों में किसी बड़े बदलाव के बार-बार जमानत अर्जी दाखिल करना पहले दिए गए फैसले की समीक्षा करने जैसा है, जिसकी आपराधिक कानून में अनुमति नहीं है। कोर्ट ने पाया कि आरोपी की पहली जमानत याचिका 20 मार्च 2026 को ही खारिज की जा चुकी थी। कोर्ट ने आरोपी की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि मामले की सुनवाई में देरी हो रही है। रिकॉर्ड के अनुसार एक साल के भीतर कुल 27 गवाहों में से 11 के बयान दर्ज किए जा चुके हैं, जो सामान्य गति है।
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कोर्ट ने अपराध को जघन्य और सजा को गंभीर मानते हुए याचिकाकर्ता को नियमित जमानत पर रिहा करने से साफ इन्कार कर दिया और याचिका को खारिज कर दिया। यह मामला 11 जुलाई 2025 का है। जब कांगड़ा जिले के जवाली पुलिस स्टेशन के तहत पीड़ित संजीव कुमार और उसका भाई अपने घर पर प्लास्टर का काम कर रहे थे। वहां पार्क किए गए उनके टेंपो को हटाने और रेत ढोने की बात को लेकर आरोपी लवकेश कुमार का उनसे विवाद हो गया। जब संजीव कुमार आरोपी को गाड़ी को नुकसान पहुंचाने से रोकने गया, तो आरोपी लवकेश ने लोहे के हथौड़े से संजीव के सिर पर जोरदार वार कर दिया। इस हमले से संजीव के सिर की हड्डी टूट गई, जिसे डॉक्टरों ने जानलेवा और गंभीर चोट बताया।
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