जाहू (हमीरपुर)। कृषि उत्पादकता के लिए मशहूर भोरंज उपमंडल आज पार्थेनियम घास की चपेट में है। घासनियों, सड़कों के किनारे, खेतों की मेंढ़ों और खाली पड़ी भूमि पर पूरी तरह से पार्थेनियम घास का कब्जा है।
इससे किसानों और पशुपालकों के लिए चिंता बढ़ गई है। भोरंज उपमंडल में करीब 10000 हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है। इसमें 5500 हेक्टेयर पर गेहूं, 4800 हेक्टेयर पर मक्की और 100 हेक्टेयर पर धान की खेती की जा रही है। दालों, तिलहन और मोटे आनाज की नाम मात्र खेती की जाती है। खाली पड़ी करीब 2000 हेक्टेयर भूमि पार्थेनियस घास की चपेट में आने से बंजर हो चुकी है।
यह घास आजादी के बाद ही भारत में 1950 में अमेरिका से आया है। यह घास बरसात में बड़े पैमाने में खेतों व खाली भूमि पर फैलता है और खरपतवार का रूप ले लेता है। तीन से चार माह में यह अपना जीवन चक्र पूरा करता है। इसके बढ़ने से कृषि भूमि के पारिस्थितिक तंत्र पर भी प्रभाव पड़ने लगा है। इससे फसलों और भूमि की उर्वरकता कम होने लगी है। लोगों के सार्वजनिक स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंच रहा है।
कोट
पार्थेनियम घास को गाजर या कांग्रेस घास के नाम से भी जाना जाता है। इस घास पर दवाई के छिड़काव का भी असर नहीं होता। इसे केवल फूल आने से पहले उखाड़ कर ही नष्ट किया जा सकता है। यह तभी खत्म होगा, जब लोग सामूहिक रूप से पूरे क्षेत्र में इसे उखाड़ें। इस घास का प्रभाव कृषि और पशुचारे पर भी पड़ रहा है।
-मोनिका शर्मा, एसएमएस, कृषि विभाग खंड भोरंज
पार्थेनियम घास स्वास्थ्य के लिए काफी नुकसानदायक है। इसके उखाड़ने से लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। इससे त्वचा रोग, एलर्जी, आंखों में जलन, लालिमा और सूजन भी हो सकती है। पशुओं के लिए भी हानिकारक है। पशुओं के दूध में कड़वाहट पैदा हो सकती है। इसलिए इसे उखाड़ते समय मुंह पर मास्क जरूर लगाना चाहिए।
-डॉ. विजेंद्र सिंह, प्रभारी, आयुष स्वास्थ्य केंद्र, खतरवाड़