हमीरपुर। जिला के बमसन ब्लॉक के गांव हरनेड़ के ललित कालिया प्राचीन देसी बीजों को पारंपरिक तरीके से सहेज रहे हैं। इन बीजों को सहेजने में मेथी के भूसे, नीम के पत्तों, सफेदे के पत्तों और देवदार की लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग का सहेज रहे हैं। प्राकृतिक विधि से खेती कर रहे प्रगतिशील किसान ललित कालिया अब भारत के प्राचीन देसी बीजों के संरक्षण एवं वितरण में भी बहुत बड़ा योगदान दे रहे हैं। वह तीन वर्ष से मोटे अनाज के बीजों को सहेज रहे हैं जबि आठ साल से प्राकृतिक खेती कर रहे हैं।
रासायनिक खाद और जहरीले कीटनाशकों के दुष्प्रभावों को देखते हुए ललित कालिया ने कुछ वर्ष पूर्व प्राकृतिक खेती को अपनाने का निर्णय लिया तथा अपनी पुश्तैनी जमीन पर प्राकृतिक विधि से फसलें लगानी शुरू कीं। ललित कालिया की इस पहल को कृषि विभाग की आतमा परियोजना के अधिकारियों के मार्गदर्शन ने नए पंख प्रदान किए। आतमा परियोजना के माध्यम से ललित कालिया हिमआर्या नेटवर्क के संपर्क में आए और प्राकृतिक खेती को बल देने के लिए उनके मन में पुराने देसी बीजों के संरक्षण का विचार आया। उन्होंने अपने घर में ही गेहूं और मक्की के साथ-साथ कई पारंपरिक मोटे अनाज, दलहनी और तिलहनी फसलों तथा सब्जियों के प्राचीन देसी बीजों का एक अच्छा-खासा बैंक तैयार कर लिया है।
उनके पास गेहूं की आठ किस्मों के देसी बीज उपलब्ध हैं। मक्की तथा जौ की भी देसी किस्में उन्होंने संरक्षित की है जोकि पौष्टिक गुणों से भरपूर हैं और कम बारिश में भी अच्छी पैदावार देती हैं। कई पारंपरिक एवं लुप्त होती मोटे अनाज की फसलें जैसे-मंढल, कोदरा, कौंगणी और बाजरा के बीज भी ललित कालिया के बीज बैंक में मिल जाते हैं। सरसों और तिल की कई पुरानी किस्मों, दलहनी फसलों में कुल्थ, रौंग, माह तथा चने के देसी भी इस बीज बैंक में हैं। यहीं पर लहसुन, प्याज, भिंडी, घीया, कद्दू, रामतोरी, धनिया, मैथी और अन्य फसलों के पुराने एवं दुर्लभ बीज कृषि विशेषज्ञों के लिए उत्सुकता का विषय हैं।
ऐसे सहेजे जा रहे फसलों के बीज
ललित कालिया ने कहा कि दालों के बीज को हल्दी और सरसों के तेल से संरक्षित किया जा सकता है जबकि पारंपरिक अनाज जिन्हे मोटा अनाज कहा जा रहा है उनके बीज में कीड़ा नहीं लगता है। मंढल, कोदरा, कौंगणी और बाजरे के बीज को नमी से बचाकर रखना ही प्र्याप्त है। इसके अलावा गेंहू, मक्की और चावल को सहेजने के लिए मेथी के भूसे, नीम के पत्तों, सफेदे के पत्तों और देवदार की लकड़ी के टुकड़ों का प्रयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि प्राकृतिक विधि से तैयार फसलों के लिए अलग से उच्च खरीद मूल्य का प्रावधान करके मुख्यमंत्री ने प्रदेश के किसानों को बहुत बड़ी सौगात दी है। उन्होंने पिछले सीजन में प्राकृतिक विधि से तैयार एक क्विंटल से अधिक मक्की बेची। इस सीजन में भी अपने परिवार की जरुरत के अलावा एक क्विंटल से अधिक गेहूं बेची और अच्छी आय अर्जित की।