नोटबंदी के चलते अस्पतालों में मरीजों की संख्या घटने लगी है। वार्डों में भी मरीजों की संख्या पहले से कम है। सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों को तो राहत है लेकिन निजी अस्पताल संचालकों की धुकधुकी बढ़ गई है। निजी अस्पतालों के वार्ड पूरी तरह खाली हैं।
सिर्फ गर्भवती या प्रसूता महिलाएं ही भर्ती हैं। इमरजेंसी केस ही अस्पतालों में पहुंच रहे हैं। पुरानी करेंसी के 500 और हजार रुपये के नोट बंद होने से अस्पतालों में रोगियों की तादाद घटने लगी है। क्षेत्रीय अस्पताल में प्रत्येक ओपीडी में 200 से 250 ओपीडी होती थी जो सौ तक भी नहीं पहुंच रही।
ओपीडी में पहुंच रहे रोगियों को अगर कोई चिकित्सक टेस्ट लिख रहा है तो रोगी पैसे न होने का हवाला देकर बाद में टेस्ट करवाने की बात कर रहे हैं। दवाई लेकर ही रोगी वापस लौट रहे हैं। इससे अस्पताल के बाहर लैब संचालकों का कारोबार भी चौपट होने लगा है।
अस्पताल के वार्डों से भी रोगी कम होने लगे हैं। गर्भवती महिलाओं को लेबर पेन होने या प्रसूता महिलाएं ही अस्पताल में एडमिट हैं। नोटबंदी के चलते कम हो रही मरीजों की संख्या से सरकारी अस्पतालों के चिकित्सकों को कुछ राहत मिली है तो निजी अस्पतालों में प्रबंधन की परेशानियां बढ़ गई हैं।
एमएस डॉ. अर्चना सोनी का कहना है कि नोटबंदी से अस्पताल में रोगियों की संख्या में कमी आई है।