सुजानपुर (हमीरपुर)। महाराजा संसार चंद कटोच का सुजानपुर टिहरा स्थित ऐतिहासिक महल और बारादरी (राज दरबार) दशकों से वीरान पड़े हैं। सुजानपुर में होली उत्सव की नींव रखने वाले कटोच वंश की इस अमूल्य धरोहर को पुरातत्व विभाग ने अपने अधीन तो ले लिया, लेकिन रियासती दौर की परंपराएं भी साथ ही विस्मृत हो गई हैं।
बारादरी के प्रांगण में स्थित वह सरोवर भी दशकों से सूखा पड़ा है, जिसके सुगंधित गुलाल और रंग कभी होली उत्सव की आत्मा हुआ करते थे। कहा जाता है कि इस सरोवर में सैकड़ों लीटर सुगंधित रंग घोलकर कटोच वंश के शासक अपनी प्रजा के साथ होली खेलते थे।
देश की आजादी के बाद यह महल पुरातत्व विभाग के अधीन आ गया, लेकिन इसके दिन नहीं बदले। वर्ष 1905 में कांगड़ा में आए विनाशकारी भूकंप ने इस सुदृढ़ इमारत को भीतर से हिला दिया। फिर भी समृद्ध इतिहास के अनेक अंश आज भी इसकी निर्माण कला और परंपराओं की जीवंत गवाही दे रहे हैं।
महल के मुख्य द्वार पर पुरातत्व विभाग और कटोच वंश, दोनों के नोटिस बोर्ड लगे हैं। कटोच वंश ने जहां इसे अपनी निजी संपत्ति बताते हुए रियासत के गौरवशाली इतिहास पर अभिमान व्यक्त किया है। वहीं, पुरातत्व विभाग ने धरोहर संरक्षण संबंधी नियम-कानूनों की जानकारी दी है। मुख्य द्वार की मरम्मत और रख-रखाव अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन जैसे ही प्रांगण में प्रवेश करते हैं, बारादरी की बदहाली साफ नज़र आती है।
पुरातत्व विभाग की बंदिशे मेला कमेटी पर भारी
पहली से 4 मार्च तक सुजानपुर में राष्ट्रीय स्तरीय होली उत्सव का आयोजन हो रहा है। ऐतिहासिक चौगान में दुकानें सज रही हैं और तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन इस उत्सव का मूल आधार बारादरी और उसका सरोवर आज भी बदहाली बयां कर रहा है। पुरातत्व विभाग के नियमों के कारण प्रशासन और मेला कमेटी यहां किसी गतिविधि से परहेज़ करती है। नतीजतन, हर साल होली उत्सव तो मनाया जाता है, पर यह महल रंगों से कोसों दूर रहता है। बारादरी के सामने कुछ रोशनी ज़रूर की जाती है, जो ऐतिहासिक चौगान से टिमटिमाती दिखती है। अब कटोच वंश के इस महल के लिए होली पर्व के यही मायने रह गए हैं।
300 साल पुराना है मेले का इतिहास
इतिहासकारों के अनुसार कटोच वंश के 481वें महाराजा संसार चंद ने 1795 ई. में सुजानपुर के चौगान में पहली बार राजमहल में तैयार विशेष गुलाल से प्रजा के साथ होली खेली थी। उसी चौगान के एक कोने में उन्होंने मुरली मनोहर मंदिर का निर्माण करवाया, जो इस होली उत्सव का आध्यात्मिक केंद्र है। इस मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ ही राष्ट्र स्तरीय होली उत्सव का आगाज होता है। रियासती दौर में राजा-रानी स्वयं यहां पूजा करते थे। आज यह परंपरा मुख्य अतिथि के रूप में आने वाले जनप्रतिनिधि या अधिकारी निभाते हैं।
राजा ने करवाया था मुरली मनोहर मंदिर का निर्माण
महाराजा संसार चंद के शासनकाल में कांगड़ा चित्रकला खूब फली-फूली। महल के मंदिरों की दीवारें आज भी कांगड़ा कलम के मनोहारी चित्रों से जीवंत हैं। मुरली मनोहर मंदिर महाराजा ने अपनी रानी प्रश्नो देवी की स्मृति में बनवाया था। इसके निर्माण में उस समय एक लाख रुपये व्यय हुए थे, इसीलिए इसे ''''लख टकिया मंदिर'''' भी कहा जाता है। कटोच वंश के राजपुरोहित के वंशज आशुतोष शर्मा बताते हैं कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से मनोकामना करते हैं, वह यहां पूरी होती है। होली उत्सव के दिन मुख्य अतिथि भगवान कृष्ण के मुख पर गुलाल लगाकर मेले का उद्घाटन करते हैं।
गौरीशंकर मंदिर की छत और दीवारों से टपक रहा पानी
महाराजा संसार चंद ने महल परिसर में गौरीशंकर मंदिर का भी निर्माण करवाया था और इसकी देखरेख का दायित्व मोहतबीन (संरक्षक) के रूप में किशन दत्त दीक्षित को सौंपा था। आज उनके प्रपौत्र सुरेश कुमार दीक्षित इस मंदिर की देखभाल कर रहे हैं। सुरेश कुमार का दर्द छलकता है जब वे कहते हैं कि पुरातत्व विभाग ने महल और मंदिर को अपने अधीन तो ले लिया, लेकिन मरम्मत में घोर कोताही बरती जा रही है। बरसात में छत पर तिरपाल डालना पड़ता है। दीवारों और छत दोनों से पानी रिसता है। होली उत्सव हर साल होता है, लेकिन अब न उस सरोवर से सुगंधित गुलाल की खुशबू उठती है और न होली के रंग इस महल तक पहुंचते हैं।