खिलाखिला कर हंसते बुजुर्गों की नम आंखों ने बयां किया जिंदगी का दर्द
वृद्ध आश्रम हीरानगर में श्राद्ध पक्ष में बढ़ गई है लोगों की आवक
कमलेश रतन भारद्वाज
हमीरपुर। वृद्ध आश्रम में जिंदगी के बाकी के पल गुजार रहे 74 वर्षीय कांगड़ा के इंदौरा निवासी शिवदत्त ने साहिर लुधियानवी की पंक्तियों से कुछ शायराना अंदाज में दर्द बयां किया। वो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन, उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना अच्छा। लुधियानवी की ये पंक्तियां बेशक एक बुजुर्ग के मुंह से निकलीं लेकिन यह आइना है समाज का जो बुजुर्गों को उम्र के इस पड़ाव पर बिसार (भुला) रहा है।
समय: 01:17। स्थान दरिद्र नारायण कल्याण समिति वृद्ध आश्रम हीरानगर। साढ़े तीन वर्ष से इस आश्रम को शिक्षा विभाग से बतौर प्रवक्ता सेवानिवृत्त हुए मिलाप सिंह संचालित कर रहे हैं। बड़े अफसरों की एक गाड़ी आश्रम के आंगन में आकर रुकती है। इन दिनों श्राद्ध चले हैं तो वृद्ध आश्रमों में भी चहल-पहल बढ़ गई है। यहां पर पहुंचे लोग बुजुर्गों को भोजन खिलाते हैं। आश्रम में एक महिला और 10 पुरुष बुजुर्ग हैं। कुछ बुजुर्ग कुछ ही दूरी पर एक आयोजन में भोजन करने गए हैं। तीन से चार बुजुर्गों को सरकारी गाड़ी में पहुंचे अफसर और कुछ महिलाएं खाना खिलाती हैं और कपड़े भी देती हैं। माहौल बेशक सामान्य है लेकिन बुजुर्गों के चेहरों के भाव मानों शून्य हों। समय 02:07। भोजन के बाद बुजुर्ग कुछ देर आराम करने के लिए बाहर कुर्सियों पर बैठे हैं। पूछने पर इंदौरा निवासी बुजुर्ग नाम बताते हैं। कहते हैं बेटा मेरा नाम शिवदत्त और शायराना अंदाज में बात रखते हैं। खिलखिला कर अपने भीतर के दर्द को भी छिपा रहे हैं। आश्रम में आने की वजह पूछी तो कहा कि उम्र के इस पड़ाव में चाहे खाना एक वक्त का मिले लेकिन सम्मान और शांति जरूरी है। खुशी भोजन नहीं बच्चों से मिलने वाले सम्मान में होती है। बेटा और बहू और पोता-पोती हैं। बच्चों से बहुत प्यार करता हूं और शायद वे भी मुझसे करते हैं। प्यार और सम्मान में अंतर ही फासले बढ़ा रहा है। तीस साल तक किन्नौर के पूह में कारोबार किया और अब यहां जिंदगी काट रहे हैं। श्राद्ध में आश्रम में बढ़ी लोगों की आवक के सवाल पर शायराना अंदाज में जवाब दिया। उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं, नींद तो दर्द के बिस्तर पर भी आ सकती है। वे शायराना अंदाज में खूब खिलखिला रहे हैं लेकिन उनके अगल-बगल में बैठे बुजुर्गों की आंखों में नमी साफ झलक रही है।
जिंदगी में कोई गम नहीं शायद यही नियति को मंजूर
बिझड़ निवासी 85 वर्षीय बुजुर्ग विधि चंद कहते हैं कि 22 साल की उम्र में शादी हुई। कुछ साल बाद पत्नी छोड़ कर चली गई। अंडेमान निकोबार में 35 वर्ष तक कार्य किया। अब न औलाद है और न अपने नाम जमीन का टुकड़ा तो समय काट रहे हैं। सौतेला भाई और एक सगी बहन है लेकिन वर्षों से उनसे मुलाकात नहीं हुई। कहते हैं कि जिंदगी में कोई गम नहीं है शायद यही नियति को मंजूर होगा।
बुजुर्गों की खुशी का छोटा सा प्रयास : मिलाप
वृद्ध आश्रम को संचालित करने वाले मिलाप सिंह कहते हैं कि 80 फीसदी बुजुर्ग ऐसे हैं जिनके नाम जमीन नहीं है। कुछ बुजुर्ग बीमार भी रहते हैं। सामाजिक सहयोग ऐसा है कि 4400 रुपये का दान लोगों से मिला है, सरकार से कोई ग्रांट नहीं मिलती है। जिंदगी के इस दौर में बुजुर्ग खुश रहें यह प्रयास किया जा रहा है।