पहाड़ों में भूस्खलन के लिए बारिश को प्रमुख कारण माना जाता है, लेकिन ऊहल बेसिन पर आईआईटी मंडी के नए अध्ययन में सड़क, नदी और भूगर्भीय संरचनाएं यानी लाइनामेंट भी बड़े नियंत्रक कारक के रूप में सामने आए हैं। क्षेत्र में भूगर्भीय हलचल और कमजोर चट्टानी परतें भी ढलानों को अस्थिर कर रही हैं। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय जर्नल फ्रंटियर्स इन अर्थ साइंस में 27 अगस्त 2026 को प्रकाशित हुआ है।
शोध आईआईटी मंडी के नितेश धीमान, अंकित सिंह और प्रो. डेरिक्स प्रेज शुक्ला ने 2025 के शुरुआत आठ महीनों में किया। शोधकर्ताओं ने मंडी जिले में करीब 756 वर्ग किमी में ऊहल बेसिन का अध्ययन किया। यहां ऊंचाई 734 से 5134 मीटर तक है। बेसिन के पश्चिमी हिस्से से मेन बाउंड्री थ्रस्ट गुजरता है। इससे क्षेत्र की भूगर्भीय सक्रियता का महत्व और बढ़ जाता है।
शोध में बताया है कि वर्ष 2015 से ऊहल बेसिन में भूस्खलन की गतिविधियों में अचानक बढ़ोतरी देखी गई। शोधकर्ताओं ने इसके लिए एमबीटी के आसपास सक्रिय भूगर्भीय हलचल के कारण कमजोर हुई चट्टानी परतों के साथ हाल के वर्षों में बढ़े बुनियादी ढांचे और सड़क चौड़ीकरण को भी महत्वपूर्ण कारण माना है। बारिश इन अस्थिर ढलानों पर भूस्खलन को बढ़ाने वाले प्रमुख ट्रिगर के रूप में काम करती है।
17% क्षेत्र अधिक संवेदनशील
सभी कारकों को मिलाकर तैयार मानचित्र में 10.71% क्षेत्र उच्च और 6.23% क्षेत्र अति उच्च भूस्खलन संवेदनशीलता वाली श्रेणी में पाया गया। यानी करीब 17% क्षेत्र अधिक संवेदनशील है। शोध में 20 उप-जलागमों में से 11 को उच्च भूगर्भीय सक्रियता वाली श्रेणी में रखा गया है।
क्षेत्रों का विश्लेषण
अध्ययन में 586 भूस्खलन क्षेत्रों की ढलान, ढलान की दिशा, चट्टानों की प्रकृति, सतही नमी, भू-आकृति, नदी से दूरी, सड़क से दूरी और लाइनामेंट से दूरी जैसे कारकों का विश्लेषण किया गया।
ये मॉडल अपनाया
विश्लेषण के लिए रैंडम फॉरेस्ट (आरएफ) और मल्टीलेयर परसेप्ट्रॉन (एमएलपी) मशीन लर्निंग मॉडल का इस्तेमाल किया गया। सभी कारकों को शामिल करने पर आरएफ मॉडल ने 85% जबकि एमएलपी की सटीकता 79% रही।
अध्ययन में सड़क, नदी और भूगर्भीय संरचनाएं प्रमुख नियंत्रक कारकों के रूप में सामने आई हैं। इनको एक साथ समझने से संवेदनशील क्षेत्रों की अधिक भरोसेमंद पहचान की जा सकती है। ऐसी जानकारी भविष्य में सुरक्षित बुनियादी ढांचे की योजना बनाने और भूस्खलन के खतरे को कम करने में मददगार हो सकती है। -डेरिक्स प्रेज शुक्ला, प्राध्यापक, आईआईटी मंडी