उन्होंने कहा कि पहाड़ी राज्य होने के कारण कठिन भौगोलिक परिस्थितियों, प्राकृतिक आपदाओं की अधिक संवेदनशीलता और बुनियादी ढांचे के निर्माण व रखरखाव की अधिक लागत से सार्वजनिक सेवाओं का संचालन महंगा है। सुक्खू ने पूंजीगत निवेश के लिए राज्यों को विशेष सहायता योजना (एसएएससीआई) के तहत आपूर्ति और विक्रेता भुगतानों को एसएनए-स्पर्श मॉडल से छूट देने का आग्रह किया। साथ ही बाह्य सहायता प्राप्त परियोजनाओं के आवंटन में वृद्धि और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों को देखते हुए इस मद की सहायता दोगुनी करने की मांग की।
उन्होंने राज्य की उधार सीमा सकल राज्य घरेलू उत्पाद के तीन से बढ़ाकर चार फीसदी करने का अनुरोध किया, ताकि प्रतिबद्ध देनदारियां पूरी करने के साथ सार्वजनिक सेवाओं और विकास कार्यों के लिए संसाधन जुटाए जा सकें। मुख्यमंत्री ने वित्तीय सुधारों और राजस्व बढ़ाने के प्रयासों की जानकारी देते हुए कहा कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मजबूत करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं। हिमाचल प्राकृतिक खेती से उत्पादित फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य देने वाला देश का पहला राज्य बना है।
इसका उद्देश्य किसानों को लाभकारी मूल्य, ग्रामीण परिवारों की प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना और अर्थव्यवस्था मजबूत करना है। सीतारमण ने मांगों पर राज्य की वित्तीय जरूरतों और विकास प्राथमिकताओं के अनुरूप सहानुभूतिपूर्वक विचार का आश्वासन दिया। उन्होंने विशेष केंद्रीय सहायता के तहत अतिरिक्त वित्तीय मदद पर भी विचार करने की बात कही। बैठक में मुख्य सचिव कमलेश कुमार पंत, प्रधान सलाहकार राम सुभग सिंह, प्रधान सचिव वित्त देवेश कुमार, मुख्यमंत्री के सचिव राकेश कंवर, प्रधान आवासीय आयुक्त अजय कुमार आदि मौजूद रहे।