भरमौर के ग्रामीण करीब 15 सालों से कर रहे मांग, अब तक नहीं खुल पाईं सरकार की आंखें
लोग बोले, जनजातीय रहन-सहन, खान,पान और संस्कृति, फिर भी दिया है गैर जनजातीय दर्जा
संवाद न्यूज एजेंसी
भरमौर (चंबा)। जनजातीय क्षेत्र भरमौर की वादियों में विकास की बातें तो बहुत हुईं लेकिन पहचान का सवाल आज भी वहीं अटका है।
27 पंचायतों के लोग खुद को उसी संस्कृति, भाषा और जीवनशैली का हिस्सा मानते हैं जिसके आधार पर पूरा क्षेत्र जनजातीय दर्जा पाता है, फिर भी वे प्रशासनिक नजर में अलग श्रेणी में दर्ज हैं। 15 साल से चली आ रही यह मांग हर चुनाव में फिर से उठती है, नेताओं के भाषणों में जगह पाती है और फिर अगले चुनाव तक के लिए टल जाती है। नतीजा यह कि यहां के लोग आज भी अपने हक और पहचान के बीच एक लंबी अधूरी लड़ाई लड़ रहे हैं।
पंचायतों को गैर जनजातीय क्षेत्र में शामिल तो कर दिया है लेकिन जनजातीय क्षेत्र का दर्जा नहीं दिया गया है। 15 सालों से ग्रामीण जनजातीय दर्जा मिलने का इंतजार कर रहे है। यह इस क्षेत्र की 27 पंचायतों के हजारों लोगों के साथ छलावा करने के समान है। ग्राम पंचायत गुराड़, डुलाडा, किलोड़, कलमला, कुनेड, राडी, भटवाड़ा, प्रीणा, गाण, बलोठ, खुंदले, लेच, कूंर, छतराड़ी, प्यूहरा, गैहरा, ब्रेही, सुनारा, तागी, लोथल, बकाण, धिमला, बंदला, फागड़ी, दाड़वी, मैहला व चड़ी का नाम शामिल है। इन पंचायतों को गैर जनजातीय दर्जा मिला है जबकि जनजातीय दर्जे के लिए अभी भी तरस रहे हैं। इन सभी पंचायतों को रहन-सहन, खान पान यहां तक की भाषा और लोक संस्कृति पूरी तरह से भरमौर से मिलती-जुलती है। विकास के मामले में भी उपरोक्त पंचायतों के 95 प्रतिशत गांव ऐसे हैं जो आज भी सड़क सुविधा को तरस रहे हैं। ऐसे में इन पंचायतों के लोगों को महज वोट बैंक के रूप में सरकार ने भरमौर विधानसभा क्षेत्र के साथ मिलाया है जबकि इन पंचायतों के लोगों को जनजातीय क्षेत्र का दर्जा नहीं दिया है। ऐसे में यह साफ होता है कि सरकार इस क्षेत्र के साथ पूरी तरह से भेदभाव का रवैया अपनाए हुए हैं।
विकास के लिए मिलता है ज्यादा बजट
गैर जनजातीय दर्जा होने से पंचायतों के विकास के लिए बजट अन्य क्षेत्रों के समान मिलता है जबकि जनजातीय दर्जा प्राप्त पंचायतों में विकास के लिए बजट अधिक मिलता है। राज्य सरकार के साथ केंद्र सरकार भी इन पंचायतों के विकास के लिए प्रयासरत रहती है।