चंबा। राममंदिर आंदोलन में शरीक होने के लिए चंबा से गए दस लोगों के समूह में शेखर मल्होत्रा सबसे युवा रहे। उनके समूह में शामिल कई लोग अब इन दुनिया में नहीं हैं।
शेखर मल्होत्रा ने बताया कि उस दौरान वह शनिदेव मंदिर के नजदीक मुगला मोहल्ला में रहते थे। चंबा से सरयू तक एक सप्ताह तक रास्ता उन्होंने बस, ट्रेन, ट्रक, ट्रालों में भूखे-प्यासे और नाममात्र खाना खाकर तय किया। राम नाम का सिमरन करते आगे बढ़ते गए। चंबा के समूह के एक किलोमीटर दायरे में फैले सरयू पुल पर 500 मीटर तक पहुंचने पर अचानक आंसू गैस के गोले, लाठियां और गोलियां चला दी गईं। जान बचाने के लिए भगदड़ मच गई। कई लोग पुल से कूद गए। भगदड़ में कइयों की जान चली गई। उन्होंने कहा कि 33 वर्ष बाद अब खुद पर गर्व महसूस होता है।
विश्व हिंदू परिषद के आह्वान पर राममंदिर आंदोलन में शामिल होने वाले शेखर मल्होत्रा वर्तमान में पंजाब के अमृतसर में बस गए हैं। पेशे से कारोबारी परिवार से ताल्लुक रखते हैं। शेखर ने बताया कि 1990 के आंदोलन के लिए घर से निकलने वाले वह सबसे युवा थे। मां ने रोते हुए उन्हें जाने से रोका था, लेकिन वह राम नाम का सिमरन करते हुए साथियों के साथ आगे बढ़ गए।
बताया कि वापसी में जैसे-तैसे ट्रकों, ट्रालों में लिफ्ट लेकर दिल्ली पहुंचे। हालांकि, दिल्ली से पठानकोट के लिए उन्हें निशुल्क ट्रेक सुविधा मिली। चंबा पहुंचने पर उन्हें दशनामी अखाड़ा में विश्व हिंदू परिषद की ओर से उमा शंकर गिरी ने पुरस्कृत किया। संवाद