चंबा। जिला चंबा की ऐसी आबादी जो अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर रहती है, वह अब बिना अनुमति जंगल से कोई भी जड़ी-बूटी नहीं निकाल सकेगी। जंगलों से धूप, गुच्छी, शहद, आंवला सहित अन्य कोई भी औषधीय जड़ी-बूटी निकालने के लिए लोगों को वन विभाग से अनुमति लेनी होगी। प्रदेश सरकार ने चंबा लघु वन उपज दोहन एवं नियति अधिनियम 2003 को खत्म कर दिया है।
प्रदेश में चंबा एक ऐसा जिला था जहां पर जंगलों से जड़ी-बूटी निकालने के लिए स्थानीय लोगों को पंचायत प्रधान भी एनओसी दे सकता था। इससे जंगलों में जड़ी बूटियों का भारी मात्रा में दोहन होता था। इसी व्यवस्था को खत्म करने पर प्रदेश में एक समान अधिनियम बनाने के उद्देश्य से सरकार ने चंबा लघु वन उपज एवं नियति अधिनियम 2003 को खत्म कर दिया है।
सरकार द्वारा इस अधिनियम को खत्म करने से सबसे ज्यादा नुकसान जनजातीय क्षेत्र भरमौर, पांगी के लोगों को हुआ है। इन क्षेत्रों के लोग जंगलों से निकलने वाली जड़ी-बूटियों को निकालकर अपने परिवार का गुजारा करते थे। इसके अलावा सलूणी, चुराह, डलहौजी के अलावा अन्य क्षेत्रों में भी लोग जंगलों से जड़ी-बूटियों का दोहन करते थे।
इस व्यवस्था को अब सरकार ने बंद कर दिया है। इसे राज्यपाल ने भी मंजूरी प्रदान दे दी है। प्रदेश में सरकार ने 13 पुराने अधिनियमों को खत्म किया है। अब प्रदेश के अन्य जिलों में जिस प्रकार से जंगलों से जड़ी बूटी निकालने के लिए परमिट दिया जाता है। उसी प्रकार से चंबा में भी लोगों को यह परमिट लेना होगा। इस परमिट को लेने के लिए लोगों को नियमानुसार फीस भी देनी होगी। इससे सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी।
मुख्य वन अरण्यपाल चंबा अभिलाष दामोदरन ने बताया कि सरकार ने चंबा लघु वन उपज दोहन एवं नियति अधिनियम 2003 को खत्म कर दिया है। अब लोगों को जंगल से कोई भी जड़ी बूटी निकालने के लिए सरकार के नए नियमों के मुताबिक अनुमति लेनी होगी।