भरमौर (चंबा)। दशहरा पर्व पर जहां पूरे उत्तर भारत में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश दिया जाता है, वहीं शिव नगरी भरमौर में इसकी परंपरा बिलकुल अलग है। यहां दशहरा पर्व पर न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही पुतला दहन। इसका कारण यह है कि इस क्षेत्र में रावण को भगवान शिव का परम भक्त और महापंडित मानकर पूजने की परंपरा है।
भरमौर के चौरासी परिसर में स्थित दशमुखी शिला को रावण की प्रतिमूर्ति माना जाता है। इस शिला के दर्शन कर लोग इसे भगवान शिव के प्रिय भक्त के रूप में नमन करते हैं। मान्यता है कि रावण ने अपनी गहन तपस्या और अटूट श्रद्धा से भगवान शिव को प्रसन्न किया था और उनका सच्चा उपासक रहा। इसी वजह से यहां रावण को जलाने के बजाय पूजने की परंपरा सदियों से चली आ रही है।
स्थानीय पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा, हरिशरण शर्मा, पंडित मनोज शर्मा, पंडित सुरेश शर्मा और देसराज शर्मा का कहना है कि पिछले पांच दशकों से चौरासी परिसर में न तो रामलीला का मंचन हुआ है और न ही रावण दहन की परंपरा रही है। उनके अनुसार बुजुर्ग भी रावण को शिवभक्त मानते आए हैं और यही परंपरा आज तक जीवित है।
चौरासी परिसर के भीतर अर्धगंगा और कपिलेश्वर महादेव लिंग स्थित है। कपिलेश्वर लिंग के पास ही एक शिला पर दशमुखी आकृति अंकित है। इसी शिला को रावण के स्वरूप में पूजने की परंपरा है। मान्यता यह भी है कि भगवान शिव की आराधना के लिए रावण का पवित्र कैलाश में प्रवास बना रहता था।
धार्मिक मान्यता : स्थानीय श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भरमौर में रावण का दहन करना शिवभक्ति के अपमान के समान होगा। इस वजह से यहां दशहरा पर्व अन्य क्षेत्रों से बिलकुल अलग रूप में मनाया जाता है।