शिमला। मणिमहेश को ‘मणि’ महेश ही क्यों कहा जाता है। मत्स्य पुराण में इस बात का संकेत है कि वास्तव में प्राचीन काल में मणिमहेश क्षेत्र में बहुमूल्य रत्नों और मणियों का भंडार था, जो भारत के किसी अन्य प्रदेश में नहीं पाया जाता था।
चंबा न केवल शिव की काशी थी, बल्कि एक पुरानी बसावट है। रावी घाटी इंद्र की प्रिय थी, जहां से उसे ऐरावत हाथी प्राप्त होते थे। इसी रावी नदी के मैदानी क्षेत्रों में प्रसिद्ध दाशराज प्रारंभिक युद्ध लड़ा गया था। रावी घाटी और चंबा के बारे में यह आश्चर्यजनक तथ्य इतिहासकार और चित्रकार डॉ. सुरेश शर्मा की पुस्तकों में सामने आए हैं। डॉ. सुरेश शर्मा की दो पुस्तकों हिदी में ‘मणिमहेश–सहस्र मणि पर्वत-झील’ व अंग्रेजी में ‘मणिमहेश- द माउंटेन लेक ऑफ थाउजेंड ज्लेल्स’ का रविवार को शिमला में विमोचन किया गया। यह कीकली चेरिटेबल ट्रस्ट के सहयोग से गेयटी थियेटर शिमला के सम्मेलन कक्ष में हुआ।
डॉ. सुरेश शर्मा ने कहा कि चंबा का ज्ञात इतिहास 920 वर्ष ईसा पूर्व तक है, जब साहिल वर्मन ने इसे अपनी राजधानी घोषित किया, परंतु यह पुस्तक 2200 वर्ष ईसा पूर्व तक इतिहास-यात्रा पर ले जाती है। इस कार्यक्रम के मुख्य अतिथि श्रीनिवास जोशी रहे, जबकि विशेष अतिथि के रूप में सुदर्शन वसिष्ठ, केआर भारती और जगदीश शर्मा उपस्थित रहे। डॉ. मीनाक्षी पॉल, भारती कुठियाला, जवाहर कौल और डॉ. अशोक तिवारी ने भी पुस्तकों के बारे में अपने विचार-विमर्श रखे। मुख्य अतिथि श्रीनिवास जोशी, विशेष अतिथि सुदर्शन वसिष्ठ, केआर भारती और जगदीश शर्मा ने भी पुस्तक और लेखक के बारे में अपने विचार साझा किए। पुराणों व प्राचीन वांग्मय के आधार पर हिंदी और अंग्रेजी में मणिमहेश विषय पर लिखी गई इन दो पुस्तकों में डॉ. सुरेश शर्मा ने रावी व चंबा वैली के बारे में कई रोचक रहस्योद्घाटन किए हैं। इस पुस्तक का विषय मणिमहेश झील और कैलाश है, जिसे प्राचीन लोग हिमवान के नाम से जानते थे। यह पुस्तकें राजा पुरुरवा की आध्यात्मिक यात्रा के प्रथमदृष्टया वृतांत की भी विस्तृत चर्चा भी करता है, जिसमें उसकी किन्नरों, यक्षों, गंधर्वों और अप्सराओं से भेंट होती है। इसमें उर्वशी और पुरुरवा की कारुणिक कथा की भी चर्चा की गई है।