चंबा। अवार्डी शिक्षक मंच हिमाचल प्रदेश ने सरकार से मांग की है कि राष्ट्रीय और राज्य पुरस्कार के बदले पुरस्कृत शिक्षकों को प्रदान किए जाने वाली वित्तीय लाभ संबंधी अधिसूचना तुरंत वापस ली जाए। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह वर्तमान सरकार की ओर से किया जाने वाला सबसे बड़ा निंदनीय कार्य होगा। अवार्डी शिक्षक मंच के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार, मुख्य सलाहकार सुशील पुंडीर और मुख्य संरक्षक ओपी गर्ग ने बताया कि सरकार शायद ही इस बात से वाकिफ हो कि यह पुरस्कार अत्यंत विशिष्ठ शिक्षकों को प्रदान किए जाते हैं जिन्होंने अपने सेवाकाल में शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्यों को अंजाम दिया है।
यह हमारी समझ से परे की बात है कि सरकार को आखिर इस नीति को बदलने की आवश्यकता क्यों पड़ी। कहा कि यदि सरकार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है तो क्या आने वाले पांच वर्षों में 20 शिक्षकों को सेवा विस्तार न देने से यह स्थिति सुधर जाएगी। कहा कि हर पुरस्कृत शिक्षक एक दिन का वेतन मुख्यमंत्री राहत कोष में दान देने के बाद एक माह का सारा वेतन देने के लिए भी तैयार हैं क्योंकि आपदाओं से जूझना केवल सरकार का ही काम नहीं बल्कि समाज को दिशा प्रदान करने वाले बुद्धिजीवी शिक्षकों का भी दायित्व है। कहा कि सरकार को ऐसी छोटी-छोटी मुश्किलों से घबरा कर ऐसे अपमानजनक फैसले लेने की आवश्यकता नहीं है। सरकार राष्ट्रीय एवं राज्य स्तर पर सर्वोच्च शिक्षक पुरस्कार हासिल करने वाले शिक्षकों को अपमानित कर रही है। कहा कि राज्य शिक्षक पुरस्कार पाने वाला शिक्षक 70 हजार शिक्षकों में से चुनकर आता है वही राष्ट्रीय स्तर पर एक शिक्षक 97 लाख शिक्षकों में से चुना जाता है। कहा कि सरकार इस प्रक्रिया को दोषी ठहरा रही है जो मानव संसाधन मंत्रालय की ओर से संचालित है। कहा कि पिछली सरकार ने तीन विशेष राज्य शिक्षक पुरस्कार प्रदान करने की नई नीति चलाई थी जिसकी चयन प्रक्रिया में सुधार की गुंजाइश है अन्यथा वर्तमान में राज्य पुरस्कार के लिए अपनाई जा रही चयन प्रक्रिया एकदम पारदर्शी और चयनबद्ध तरीके से तैयार की गई है। यही करण है कि प्रतिवर्ष 24 में से 12 या 15 शिक्षक ही इस चयन प्रणाली को उत्तीर्ण कर पाते हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू से आग्रह किया है कि दो दिन पहले जारी की गई अवार्डी शिक्षकों को मिलने वाले वित्तीय लाभ संबंधी अधिसूचना रद्द कर 2015 की अधिसूचना को लगातार किया जाए।