चंबा। जनजातीय क्षेत्र पांगी के आंगनबाड़ी के बच्चों-विद्यार्थियों को अब पौष्टिकता युक्त देसी दूध पीने को मिलेगा।
साल में छह माह तक बर्फ की कैद में रहने वाले पांगी क्षेत्र के नौनिहालों-विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पैकेट बंद (एक्सपायरी) दूध के सेवन से पड़ने वाले दुष्प्रभाव को खत्म करने और उन्हें स्वस्थ रखने के उद्देश्य से पांगी प्रशासन ने कदम बढ़ाया है। प्रशासन ने स्थानीय लोगों, स्कूल प्रधानाचार्यों समेत अन्य अधिकारियों की सहमति से पैकेट बंद दूध के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया है। अब आदर्श आचार संहिता हटने के बाद आंगनबाड़ी केंद्रों और स्कूल स्तर पर इसके लिए बाकायदा टेंडर प्रक्रिया होगी। इससे स्थानीय महिला मंडलों में शामिल महिलाओं और अन्य स्वयं सहायता समूहों में शामिल लोगों के लिए रोजगार के द्वार भी खुलेंगे।
जनजातीय क्षेत्र पांगी में 65 आंगनबाड़ी केंद्र, 65 प्राइमरी स्कूल, 12 मिडिल स्कूल, 8 उच्च विद्यालय, 9 वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय और एक हॉस्टल हैं। यहां सैकड़ों की संख्या में नौनिहाल और विद्यार्थी शिक्षा अर्जित करने के लिए पहुंचते हैं। आंगनबाड़ी केंद्रों में पहुंचने वाले नौनिहालों को केंद्र की ओर से कई प्रकार के पौष्टिकता युक्त न्यूट्रीशियन दिए जाते हैं, जबकि विद्यालयों और हॉस्टल में बच्चों को मिड-डे मील समेत पीने के लिए दूध भी दिया जाता हैं। जनजातीय क्षेत्र पांगी की बात की जाए तो यहां असंख्य गोधन है। बच्चों के स्वास्थ्य और पांगी में स्वच्छता और सुंदरता बनाए रखने के लिए अब पांगी प्रशासन ने स्कूल के प्रधानाचार्यो और लोगों संग मिल कर पैकेट दूध के इस्तेमाल करने के बजाय स्थानीय गायों या चूरी के दूध का इस्तेमाल करने पर बल देने की योजना बनाई है। आदर्श आचार संहिता के बाद यह कार्य शुरू होगा।
मेडिकल कॉलेज चंबा के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. बिपन शर्मा ने बताया कि पैकेट बंद दूध के बजाय गाय या चूरी के दूध के सेवन करने संबंधी परामर्श चिकित्सक भी देते हैं। पैकेट बंद दूध में एक्सपायरी डेट तक सभी प्रकार के पोषक तत्व इसमें विद्यमान रहते हैं, लेकिन दूध की एक्सपायरी डेट हो जाने के बाद ये किसी बड़ी बीमारी का भी कारण बन सकता है। लिहाजा, चूरी या गाय के दूध के सेवन को ही चिकित्सक भी सही मानते हुए पीने की सलाह देते हैं।
आवासीय आयुक्त रीतिका जिंदल ने बताया कि पांगी क्षेत्र वर्ष के छह माह देश-दुनिया से कटा रहता है। इसके अलावा यहां के आंगनबाड़ी केंद्रों, स्कूलों और हॉस्टल में पैकेट बंद दूध के बजाए स्थानीय गाय या चूरी के दूध के इस्तेमाल को लेकर सभी ने हामी भरी है। जिसके तहत जून माह के मध्य के बाद प्रयास आरंभ होंगे।