चंबा। पवित्र मणिमहेश यात्रा की परंपराएं समय के साथ-साथ बदल रही हैं। कृष्ण जन्माष्टमी के उपलक्ष्य पर होने वाले छोटे शाही स्नान को जौग न्हौण कहा जाता था। इसके साथ ही इस दौरान मात्र सन्यासी, साधु और संत ही डल में डुबकी लगाने के लिए जाते थे। वहीं, राधाष्टमी के उपलक्ष्य पर होने वाले बड़े शाही स्नान में मात्र नवदंपति और बुजुर्ग ही डल में डुबकी लगाते थे। मगर अब यह प्रथा पुरी तरह ही बदल गई है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि पवित्र मणिमहेश यात्रा के बाद पवित्र डल में डुबकी लगाने वाले श्रद्धालुओं की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है।
वहीं, दूसरी और अब यात्रा के लिए बनाए गए पुराने नियमों को बदलाव हो चुका है। गौरतलब हो कि मणिमहेश यात्रा का स्वरूप समय के साथ-साथ बदलता जा रहा है। वर्तमान समय में देेश के कोने-कोने से शिवभक्त पवित्र मणिमहेश यात्रा पर डुबकी लगाने के लिए पहुंचते हैं। जबकि, यात्रा के साथ पुरानी परंपराएं कुछ अलग ही थी।
वहीं, दूसरी और प्रशासन भी पवित्र मणिमहेश यात्रा का विस्तार करने पर विचार कर रही है। इसके अलावा अब लोग पवित्र मणिमहेश यात्रा को 15 दिनों के बजाए तीन माह तक चलाने की मांग उठा रहे हैं। पंडित दत्त राम शर्मा ने बताया कि मणिमहेश यात्रा के तहत पहले छोटे शाही स्नान को जौण न्हौण के नाम से ही जाना जाता था। जौण न्हौण में केवल मात्र सन्यासी, साधु और संत ही पवित्र डल में डुबकी लगाने के लिए जाते थे। पंडित हरिशरण शर्मा ने बताया कि कृष्णाष्टमी और राधाष्टमी के उपलक्ष्य पर होने वाले शाही स्नान को लेकर अपनी-अपनी धार्मिक आस्थाएं थीं। कृष्णाष्टमी के स्नान को जौण न्हौण कहा जाता था। इसके अलावा राधा अष्टमी के उपलक्ष्य पर बड़ा न्हौण होता था। इसमें सभी लोग श्रद्धा की डुबकी लगाते थे।
जड़ी बूटियां एकत्रित करते थे साधु संत
पंडित लक्ष्मण दत्त शर्मा जौण न्हौण के बारे में बताते हैं कि इस दौरान साधु, संत और सन्यासी जड़ी-बूटियों को एकत्रित करने के लिए भी पवित्र यात्रा पर जाते थे। समय के साथ अब न्हौण संबंधी रीति-रिवाजों में काफी बदलाव हो चुका है।