ग्राउंड रिपोर्ट
सरकारी उपेक्षा की भेंट चढ़ा पशु औषधालय सुंई सुराहड़
दवाइयों की अलमारियां खाली, किसान जेब से खर्च को मजबूर
संवाद न्यूज एजेंसी
मलोखर (बिलासपुर)। सुंई सुराहड़ और बाड़नु डिगथली पंचायतों के बीच स्थित राजकीय पशु औषधालय आज न केवल क्षेत्र के पशुपालकों की चिंता का कारण बना हुआ है, बल्कि यह सरकारी व्यवस्था की जमीनी सच्चाई भी उजागर करता है। जिस औषधालय की नींव ग्रामीण पशुपालकों को राहत देने के उद्देश्य से रखी गई थी, वह आज विभागीय लापरवाही के चलते खुद अस्तित्व की लड़ाई लड़ता नजर आ रहा है।
इस औषधालय पर दो पंचायतों सुंई सुराहड़ और बाड़नु डिगथली के लगभग 600 से 700 परिवार निर्भर हैं। इलाके में करीब 700 गाय और बैल, 150 भैंसें, 1200 से अधिक बकरियां हैं। खेती के साथ पशुपालन ही ग्रामीणों की आजीविका का मुख्य सहारा है, लेकिन इतने बड़े पशुधन क्षेत्र के लिए सुंई सुराहड़ पशु औषधालय में न तो आधुनिक चिकित्सा उपकरण उपलब्ध हैं और न ही गंभीर रूप से बीमार पशुओं के लिए लिफ्टिंग या ऑपरेशन जैसी सुविधाएं। सुंई सुराहड़ पशु औषधालय का शिलान्यास 15 सितंबर 2006 को किया गया था, जबकि 28 जनवरी 2009 को इसका उद्घाटन हुआ। उद्घाटन के समय उम्मीद जताई गई थी कि यहां भविष्य में कई उच्च स्तरीय सुविधाएं अपग्रेड की जाएंगी, लेकिन वर्षों बीत जाने के बावजूद न तो कोई विस्तार हुआ और न ही बुनियादी ढांचे को मजबूत किया गया।
भवन के चारों ओर चहारदीवारी नहीं है। सरकारी सूचना बोर्ड तक नहीं लगाया गया है। खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं, दरवाजे क्षतिग्रस्त हैं। छत में सीलन और दरारें साफ दिखाई देती हैं, लंबे समय से पेंट और मरम्मत नहीं हुई है।भवन के पीछे पहाड़ी से मिट्टी और पत्थर गिरने का खतरा बना हुआ है। बारिश के मौसम में भवन के अंदर पानी टपकता है, जिससे न केवल स्टाफ को परेशानी होती है बल्कि मरीज पशुओं को लाने में डर बना रहता है। पिछले एक वर्ष से औषधालय में दवाइयों की सप्लाई नहीं हुई है। जरूरी दवाइयां तक उपलब्ध नहीं हैं।
सरकारी अस्पताल होने के बावजूद पशुपालकों को पशुओं के इलाज के लिए दवाई खरीद करने के लिए निजी दुकानों का सहारा लेना पड़ता है। दवाइयों पर हर महीने हजारों रुपये खर्च हो रहे हैं। जब सरकार पशुपालन को बढ़ावा देने की बात करती है, तो फिर सरकारी औषधालयों में दवाइयों की कमी क्यों है। पशुपालकों ने पशुपालन विभाग से मांग की है कि औषधालय भवन की तत्काल मरम्मत करवाई जाए। दवाइयों की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित की जाए। आधुनिक मशीनें और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। विभागीय अधिकारी मौके पर पहुंचकर जमीनी हकीकत की समीक्षा करें। सच्चाई यही है कि जिस औषधालय से हजारों पशुओं की सेहत संभालनी थी, वह आज खुद प्रशासनिक उदासीनता का शिकार है। यदि जल्द सुधार नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर पशुधन, किसानों की आय और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय है।
इनसेट
पंचायत ने दिखाई सक्रियता, विभाग बना दर्शक
वर्ष 2025 में ग्राम पंचायत सुंई सुराहड़ ने अपने संसाधनों से औषधालय परिसर में सीमेंट की टाइलें लगवाईं थीं, ताकि पशुपालकों और कर्मचारियों को कुछ राहत मिल सके। इसके बाद भी भवन की मरम्मत, सौंदर्यीकरण और आधारभूत ढांचे को मजबूत करने के लिए विभाग की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए।
इनसेट
सीमित स्टाफ, सुविधाओं का संकट
औषधालय में वर्तमान में केवल फार्मासिस्ट राम गोपाल दास, क्लास फोर कर्मचारी जगत राम तैनात हैं। दवाइयों, उपकरणों और आधारभूत सुविधाओं की कमी के कारण पशुपालकों को पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा है। किसानों और पशुपालकों का आरोप है कि पशुपालन विभाग के उच्च अधिकारी कभी जमीनी स्तर पर निरीक्षण करने नहीं आते। पशु औषधालय कागजों में तो चल रहे हैं, लेकिन वास्तविक स्थिति बेहद दयनीय है। यदि समय-समय पर निरीक्षण होता, तो आज यह हालत न होती।
कोट
दवाइयों का टेंडर स्टेट लेवल पर होता है जो हो चुका है। दवाइयां मंगवा ली हैं। दवाइयां आने के बाद उनकी सैंपलिंग होती है, वो भी करवा ली है। अब जैसे ही सैंपलिंग की रिपोर्ट आएगी, वैसे ही मेडिसिन फील्ड में डिस्ट्रीब्यूट कर देंगे। भवन की मरम्मत का एस्टीमेट भेजा हुआ है। निदेशालय में जैसे ही बजट आएगा, तो मरम्मत हो जाएगी।
-डॉ. विनोद कुंदी, उप निदेशक, पशुपालन विभाग बिलासपुर